लहसुन-प्याज मुक्त राष्ट्रवाद: जब थाली से तय होने लगा देशभक्ति का सर्टिफिकेट

भारत में आपका चरित्र, आपकी देशभक्ति और आपके संस्कार इस बात पर निर्भर नहीं करते कि आप कानून का कितना पालन करते हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर करते हैं कि आपकी कढ़ाई में क्या पक रहा है। ‘काक-वाणी’ के इस तीखे बुलेटिन में आपका स्वागत है, जहाँ आज हम चर्चा करेंगे देश के सबसे ज्वलंत मुद्दे पर—’खाने की थाली’ का राजनीतिकरण!

सब्जियों का सैनिटाइजेशन और ‘सात्विक’ लोकतंत्र

फ्रंटलाइन की रिपोर्ट बताती है कि भारत में शाकाहार अब केवल एक व्यक्तिगत भोजन की पसंद नहीं रहा, बल्कि यह एक उग्र राजनीतिक हथियार बन चुका है। सत्ताधारी भाजपा (BJP) और उसके वैचारिक सहयोगियों ने देश को एक नया ‘सात्विक विजन’ दिया है। इस विजन के तहत, यदि आप बिना प्याज-लहसुन का भोजन करते हैं, तो आप सीधे ‘परम देशभक्त’ घोषित किए जा सकते हैं। लेकिन, अगर आपने गलती से भी भोजन में प्रोटीन के अन्य स्रोतों (जैसे अंडा या मांस) की मांग कर ली, तो समझो समाज की नजरों में आपका चरित्र प्रमाण पत्र ही निरस्त हो गया।

आजकल लोकतंत्र में बहस इस बात पर नहीं होती कि युवाओं को रोजगार मिला या नहीं, बल्कि इस पर होती है कि किस त्यौहार में किस दुकान को बंद कराया जाए। पुलिस और स्थानीय प्रशासन अब अपराधियों को पकड़ने से ज्यादा इस बात की मुस्तैदी में लगे रहते हैं कि किसी ढाबे या रेस्तरां की रसोई में क्या पक रहा है। आखिरकार, देश के विकास से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हमारी थाली की ‘पवित्रता’ की रक्षा करना जो है!

पनीर-टिक्का बनाम चिकन-टिक्का की जंग

हालत यह हो चुकी है कि हाउसिंग सोसायटियों के गेट पर तैनात गार्ड अब आगंतुकों के पहचान पत्र से ज्यादा जोमैटो और स्विगी के डिलीवरी बॉय के डिब्बों को सूंघकर अंदर जाने की अनुमति देते हैं। समाज में इस ‘शाकाहारी कट्टरपंथ’ का ऐसा खौफ पैदा किया जा रहा है कि मानो देश के सारे संकटों की जड़ लहसुन-प्याज और चिकन-बिरयानी ही हैं।

मजेदार बात यह है कि जो लोग भ्रष्टाचार की मलाई और जनता की गाढ़ी कमाई को बिना डकार लिए पचा जाते हैं, वे भी शाम को पनीर-टिक्का खाकर खुद को परम संस्कारी और अहिंसक साबित करने का गौरव प्राप्त कर लेते हैं। इस पूरी राजनीति में आम आदमी के कुपोषण पर कोई बात नहीं करना चाहता, लेकिन थाली पर पहरा लगाने की होड़ जरूर मची हुई है।

काक-वाणी का तो यही मानना है कि यदि आपको इस नए भारत में शांति से रहना है, तो अपनी थाली में केवल वही रखिए जो सरकार को पच सके। अन्यथा, याद रखिए कि आपकी रसोई से निकलने वाली छौंक की खुशबू भी आपके लिए ‘विपक्ष’ का एजेंट होने का टिकट कटा सकती है!


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी