बॉलीवुड और विवादों का चोली-दामन का साथ है। कभी गानों पर बवाल, कभी स्टार्स के बयानों पर घमासान, और अब फिल्मों की स्क्रिप्ट पर ही सवाल उठने लगे हैं। ‘द मिल्ली गजट’ की एक हालिया रिपोर्ट ने सोशल मीडिया पर एक नई बहस छेड़ दी है। इस रिपोर्ट का दावा है कि आज की Bollywood Movies में एक खास समुदाय को टारगेट करके एंटी-मुस्लिम नैरेटिव सेट किया जा रहा है। अब इस गंभीर मुद्दे पर ‘काक-वाणी’ चुप कैसे रह सकती है? तो चलिए, जरा खंगालते हैं कि आखिर इस फिल्मी मसाले के पीछे का सच क्या है!
गब्बर से ‘खास विलेन’ तक का फिल्मी सफर
एक जमाना था जब बॉलीवुड फिल्मों में विलेन का मतलब होता था रामगढ़ का खूंखार डाकू गब्बर सिंह, या फिर शाकाल और मोगैम्बो जैसे काल्पनिक खलनायक। उस वक्त विलेन का कोई तय धर्म या समुदाय नहीं होता था, उसका एकमात्र धर्म सिर्फ और सिर्फ ‘अत्याचार’ करना होता था। लेकिन बदलते वक्त के साथ बॉलीवुड के विलेन भी हाईटेक और ‘विशिष्ट’ हो गए हैं। ‘द मिल्ली गजट’ की रिपोर्ट कहती है कि आज फिल्मों में देशभक्ति दिखाने का सबसे आसान तरीका यह बन गया है कि विलेन को एक खास धार्मिक पहचान और पहनावे के साथ पेश कर दिया जाए।
बॉक्स ऑफिस पर ‘नैरेटिव’ का नया तड़का
फिल्म मेकर्स को अब समझ आ गया है कि दर्शकों को थियेटर तक खींचने और फिल्म को 100 करोड़ के क्लब में शामिल कराने का सबसे आसान फॉर्मूला क्या है—थोड़ा राष्ट्रवाद, थोड़ा इतिहास का हेर-फेर और एक बड़ा सा विलेन। हाल के दिनों में आई कई बड़ी फिल्मों को देखकर दर्शकों का एक वर्ग भी यह मानने लगा है कि कहानियों में रचनात्मकता से ज्यादा जोर एक खास नैरेटिव को गढ़ने में लगाया जा रहा है। काक-वाणी का मानना है कि सिनेमा समाज का आइना होता है, लेकिन जब आइने पर ही किसी खास रंग का चश्मा चढ़ा दिया जाए, तो तस्वीर धुंधली दिखने लगती है।
काक-वाणी की दो टूक: जनता सब जानती है!
सिनेमा के इस बदलते रंग पर बहसें चलती रहेंगी। कुछ लोग इसे ‘कड़वी हकीकत’ का नाम देते हैं, तो कुछ इसे केवल नफरत फैलाने वाला प्रोपेगैंडा मानते हैं। लेकिन बॉलीवुड को यह याद रखना होगा कि भारतीय दर्शक बेहद समझदार हैं। सोशल मीडिया पर चाहे कितना भी शोर मचे, जो फिल्म केवल नफरत के सहारे चलती है, उसे दर्शक अंततः नकार ही देते हैं। नफरत की स्क्रिप्ट लिखकर कभी भी ‘शोले’ या ‘दंगल’ जैसी कालजयी फिल्में नहीं बनाई जा सकतीं। सिनेमा का असली काम दिलों को जोड़ना है, उनमें दूरियां पैदा करना नहीं।
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