लोकतंत्र बचाने का नया तरीका: एक मुख्य चुनाव आयुक्त और हजारों हथियारबंद जवान!

अरे भई वाह! अंतरराष्ट्रीय मीडिया रॉयटर्स ने खबर दी है कि हमारी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक महा-उत्सव की तैयारी हो रही है। उत्सव यह नहीं है कि लोकतंत्र का कोई नया कीर्तिमान रचा गया है, बल्कि उत्सव यह है कि हमारे देश के ‘परम निष्पक्ष’ चुनाव आयुक्त महोदय के खिलाफ होने वाले एक अदना से विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए हजारों सुरक्षा बल तैनात किए जा रहे हैं। जी हां, आपने बिल्कुल सही सुना—हजारों जवान!

लोकतंत्र इतना नाजुक कि हवा के झोंके से भी कांप जाए!

काक-वाणी को तो लगता है कि भारत का लोकतंत्र अब इतना संवेदनशील और नाजुक हो चुका है कि अगर चार लोग तख्तियां लेकर “हाय-हाय” चिल्ला दें, तो पूरी प्रशासनिक इमारत भरभराकर गिर सकती है। सोचिए, विरोध करने वाले कौन हैं? कुछ विपक्षी नेता और उनके कार्यकर्ता। उनके पास हथियार क्या हैं? कागज के बैनर, कुछ नारे और शायद पानी की कुछ बोतलें! लेकिन हमारी महान सरकार को लगता है कि यह कोई विदेशी आक्रमण है। इसीलिए तो छावनी जैसी किलेबंदी की गई है, मानो सामने से नेपोलियन की सेना आ रही हो।

‘निष्पक्षता’ की रक्षा अब संगीनों के साए में होगी

वाह रे हमारा महान लोकतंत्र! जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो उनका जवाब दलीलों या पारदर्शिता से नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों के बूटों की धमक से दिया जाता है। आखिर पोल चीफ की कुर्सी इतनी पवित्र और नाजुक जो है! अगर कोई नागरिक या विपक्षी दल उस कुर्सी की नीयत पर सवाल उठा दे, तो ‘मर्यादा’ की रक्षा के लिए बैरिकेड्स, वॉटर कैनन और दंगा रोधी दस्तों को ही आगे आना पड़ेगा। संवाद की गुंजाइश तो बस भाषणों तक सीमित है, सड़कों पर तो केवल खाकी का जलवा होना चाहिए।

हमें तो यह देखकर गर्व होता है कि हमारे देश में एक चुनाव अधिकारी की सुरक्षा का स्तर किसी विश्व नेता से भी बड़ा कर दिया गया है। जनता अगर अपने मताधिकार और चुनावी शुचिता पर सवाल पूछे, तो उसे यह समझा दिया जाता है कि ‘चुप रहो, वरना सुरक्षा बल तुम्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया का असली मतलब समझा देंगे।’

निष्कर्ष: खाकी के साए में खिलता लोकतंत्र

अंत में, काक-वाणी इस अभूतपूर्व व्यवस्था की भूरि-भूरि प्रशंसा करती है। जिस देश में चुनाव अधिकारी को अपनी ही जनता के विरोध से बचाने के लिए एक छोटी-मोटी सेना बुलानी पड़े, उस देश का लोकतंत्र वाकई में ‘अमर’ है। अगली बार अगर कोई विदेशी मीडिया कहे कि भारत में लोकतंत्र पर सवाल उठ रहे हैं, तो उन्हें दिल्ली की सीमाओं पर तैनात ये हजारों जवान दिखा दीजिएगा—आखिर वे लोकतंत्र की रक्षा ही तो कर रहे हैं, भले ही वह रक्षा खुद जनता के खिलाफ ही क्यों न हो!


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कागा जी