वाह! ‘द हिंदू’ अखबार के बुद्धिजीवियों को अचानक याद आया है कि हमारा लोकतंत्र 80 साल का होने को है और इसे ‘रिन्यूअल’ यानी नवीनीकरण की सख्त जरूरत है। वैसे, इस देश में ‘रिन्यू’ कराने की परंपरा बहुत पुरानी है—ड्राइविंग लाइसेंस से लेकर गाड़ी के प्रदूषण सर्टिफिकेट तक, सब समय पर रिन्यू कराना पड़ता है। लेकिन लोकतंत्र का रिन्यूअल? इस गंभीर विषय पर हमारे सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के माननीय नेताओं से बेहतर भला कौन सोच सकता है!
नेताओं का ‘रिन्यूअल’ फॉर्मूला: कल के दुश्मन, आज के भाई
अखबार चिंतित है कि हमारा लोकतंत्र बूढ़ा और थका हुआ लग रहा है। अरे साहब! जरा लुटियंस दिल्ली और राज्यों की राजधानियों की खिड़की से बाहर झांकिए। हमारे नेता तो रोज लोकतंत्र का ‘सेल्फ-रिन्यूअल’ कर रहे हैं। कल तक जो नेता विपक्ष में रहकर ‘भ्रष्टाचार और तानाशाही’ का विलाप कर रहा था, आज वह सत्तारूढ़ दल की जादुई वॉशिंग मशीन में धुलकर एकदम ‘रिन्यू’ होकर बाहर निकलता है। विपक्ष के नेता सुबह उठकर संविधान बचाने की दुहाई देते हैं और शाम को पाला बदलकर सत्ता की मलाई चाटने पहुंच जाते हैं। इसे कहते हैं ‘इंस्टेंट रिन्यूअल’। इसके लिए किसी लंबी कागजी कार्रवाई की जरूरत नहीं पड़ती, बस एक पाला बदलने की कला आनी चाहिए।
ईडी, सीबीआई और लोकतंत्र का ‘एंटी-एजिंग’ ट्रीटमेंट
लोकतंत्र को जवान रखने के लिए आज के दौर में बेहतरीन ‘एंटी-एजिंग’ कॉस्मेटिक्स उपलब्ध हैं। ईडी, सीबीआई और आईटी जैसी सरकारी एजेंसियां लोकतंत्र के चेहरे पर विपक्ष नाम की झुर्रियां नहीं आने देतीं। जैसे ही किसी विपक्षी नेता के चेहरे पर ‘बगावत’ की झुर्रियां दिखती हैं, ये एजेंसियां तुरंत ‘एंटी-एजिंग’ ट्रीटमेंट लेकर पहुंच जाती हैं। इसके बाद नेताजी का हृदय परिवर्तन होता है और वे नए राष्ट्रवाद के रंग में रंगकर बिल्कुल तरोताजा हो जाते हैं। क्या यह लोकतंत्र का शानदार रिन्यूअल नहीं है? बुद्धिजीवी इसे ‘संस्थानों का दुरुपयोग’ कह सकते हैं, पर ‘काक-वाणी’ इसे विशुद्ध प्रशासनिक कॉस्मेटिक सर्जरी मानती है।
आम जनता के लिए सिर्फ ‘वोटर आईडी’ का रिन्यूअल
इस पूरे भव्य रिन्यूअल प्रोसेस में आम आदमी की भूमिका सिर्फ इतनी तय की गई है कि वह हर पांच साल में पोलिंग बूथ पर जाए, अपनी उंगली पर स्याही लगवाए और अपना वोटर आईडी कार्ड रिन्यू महसूस करे। लोकतंत्र के इस महायज्ञ में जनता केवल ‘समिधा’ यानी हवन सामग्री है, जबकि असली यजमान तो संसद और विधानसभाओं में बैठकर अपनी तिजोरियों का रिन्यूअल कर रहे हैं।
इसलिए, ‘द हिंदू’ के चिंतकों को घबराने की कोई जरूरत नहीं है। जब तक हमारे पास पाला बदलने वाले ‘फ्लेक्सिबल’ नेता और हवा का रुख भांपने वाले रणनीतिकार हैं, तब तक भारतीय लोकतंत्र का रिन्यूअल ‘ऑटो-डेबिट’ मोड पर चलता रहेगा। आखिरकार, जनता का भला हो न हो, नेताओं की राजनीतिक दुकान का लाइसेंस कभी एक्सपायर नहीं होना चाहिए!
संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें