एक अनोखा और अटूट रिश्ता
रामू एक गरीब लकड़हारा था, जिसका इस दुनिया में चीतक नाम के एक कुत्ते के अलावा कोई नहीं था। चीतक सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि रामू का साया था। दोनों एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी थे। एक साल गांव में भयंकर सूखा पड़ा। दाने-दाने को तरसते रामू को अपनी आजीविका चलाने के लिए गांव के एक अमीर साहूकार से कर्ज लेना पड़ा। साहूकार ने कर्ज के बदले रामू के सबसे प्यारे चीतक को धरोहर के रूप में अपने पास गिरवी रख लिया। रामू की आंखों में आंसू थे, पर लाचारी के आगे वह बेबस था। उसने भारी मन से चीतक के सिर पर हाथ फेरा और कहा, “मेरे दोस्त, खुद को साबित करना। मैं जल्द ही तुम्हें वापस लेने आऊंगा।”
वफादारी का इम्तिहान
चीतक साहूकार के घर रहने लगा। वह रात-भर जागकर साहूकार के घर की रखवाली करता था। एक रात, कुछ चालाक चोरों ने साहूकार के घर पर धावा बोल दिया। उन्होंने तिजोरी से सारा कीमती सामान चुरा लिया और भागने लगे। चीतक ने अपनी सूझबूझ से चोरों का पीछा किया और वह स्थान देख लिया जहाँ चोरों ने माल छुपाया था। सुबह होते ही चीतक ने साहूकार की धोती खींचकर उसे उस गुप्त स्थान तक पहुंचाया। साहूकार को अपना सारा धन सुरक्षित मिल गया। साहूकार चीतक की इस वफादारी और बुद्धिमानी से बेहद भावुक हो गया। उसने सोचा कि इस वफादार जीव को अब कैद में रखना पाप है। उसने चीतक के गले में एक पत्र बांधा, जिसमें उसकी तारीफ और रामू का कर्ज माफ होने की बात लिखी थी, और उसे रामू के पास वापस भेज दिया।
क्रोध और जल्दबाजी का घातक वार
उधर, रामू भी कुछ पैसे कमाकर साहूकार के घर की तरफ ही आ रहा था ताकि वह चीतक को छुड़ा सके। रास्ते में उसने दूर से चीतक को अपनी तरफ दौड़ते हुए आते देखा। रामू को लगा कि चीतक साहूकार के यहाँ से भागकर आया है और उसने रामू के मान-सम्मान को मिट्टी में मिला दिया है। रामू का विवेक गुस्से की आग में जल उठा। उसने बिना सोचे-समझे जमीन पर पड़ी एक भारी लाठी उठाई और चीतक के पास आते ही उसके सिर पर दे मारी। चीतक वहीं गिर पड़ा। उसने दर्द से कराहते हुए अपनी आखिरी और मासूम नजरें अपने प्यारे मालिक पर डालीं, मानो पूछ रहा हो – “मेरी यही खता थी?” और उसने दम तोड़ दिया।
जीवनभर का पछतावा और सीख
चीतक के बेजान शरीर को देखकर रामू का दिल बैठ गया। तभी उसकी नजर चीतक के गले में बंधे उस पत्र पर पड़ी। रामू ने कांपते हाथों से पत्र खोला और पढ़ा: “रामू, तुम्हारे इस देवतुल्य कुत्ते ने मेरी चोरी हुई सारी संपत्ति वापस दिलाकर मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। मैं तुम्हारा सारा कर्ज माफ करता हूँ और इसे सहर्ष तुम्हें सौंप रहा हूँ।”
पत्र पढ़ते ही रामू के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह चीतक के शव से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगा, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। जल्दबाजी में किए गए उसके एक फैसले ने उसके सबसे सच्चे दोस्त को हमेशा के लिए उससे छीन लिया था।
सीख (Moral): इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि क्रोध और जल्दबाजी में लिया गया फैसला हमेशा विनाशकारी होता है। किसी भी परिस्थिति में बिना सच जाने और बिना सोचे-समझे कोई कदम नहीं उठाना चाहिए, क्योंकि एक बार हाथ से छूटा हुआ तीर और खोया हुआ समय कभी वापस नहीं आता।