भारत का ‘कैमलोट मोमेंट’: जब लुटियंस के शूरवीरों ने कीचड़ में खोजा ‘किंग आर्थर’ का मुकुट

कांव-कांव! सुबह-सुबह जब हमारे घोंसले में ‘द वायर’ की कतरन उड़कर आई, तो हमारी कौआ-बुद्धि चकरा गई। लुटियंस दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठे बुद्धिजीवियों ने आखिरकार भारत के लिए ‘कैमलोट मोमेंट’ (Camelot Moment) ढूंढ ही निकाला। अब जिन्हें ‘कैमलोट’ का साहित्यिक मतलब नहीं पता, उन्हें बता दें कि यह राजा आर्थर की वह काल्पनिक जादुई नगरी थी, जहां सत्य, न्याय और शूरवीरता का वास था। यानी सीधे शब्दों में कहें तो, हमारे बुद्धिजीवियों को भारतीय राजनीति के इस चिर-परिचित कीचड़ में ‘किंग आर्थर’ और उनकी पवित्र गोलमेज (Round Table) के दिव्य दर्शन हो गए हैं।

लुटियंस के शूरवीर और जादुई तलवार

इस अद्भुत थ्योरी के अनुसार, हमारे विपक्षी शहजादे अब हाथ में न्याय का डंडा (या लाल रंग के संविधान की प्रति) थामे ‘किंग आर्थर’ की भूमिका में आ चुके हैं। संसद की कैंटीन अब ‘गोलमेज’ बन चुकी है, जहां समोसे की प्लेट पर देश को बचाने की महान रणनीतियां बनती हैं। अंग्रेजी मीडिया के इन कलमघसीटों को लगता है कि जैसे ही चुनाव में विपक्ष की कुछ सीटें बढ़ीं, देश में सीधे मध्यकालीन यूरोपीय रूमानियत का प्रवेश हो गया। अब बस कमी है तो एक ‘मर्लिन’ जादूगर की, जो शायद किसी विदेशी यूनिवर्सिटी या वाशिंगटन के थिंक-टैंक में बैठकर नई भविष्यवाणी लिख रहा हो।

भारतीय कीचड़ में ‘कैमलोट’ का कमल?

कितना प्यारा लगता है न यह सोचना! उधर जमीन पर नेताजी जातिगत समीकरण बिठाने के लिए कार्यकर्ताओं को गालियां दे रहे हैं, इधर अंग्रेजी पत्रकारिता के मसीहा इसे ‘कैमलोट की नई बयार’ बता रहे हैं। जहां हर गठबंधन आपसी खींचतान, ब्लैकमेलिंग और ‘तुम मुझे क्या दोगे’ की नीति पर टिका हो, वहां इन पत्रकारों को राजा आर्थर के निष्काम शूरवीर दिखाई दे रहे हैं। असल में, जब हकीकत बेहद कड़वी और बदरंग हो, तो लुटियंस के बौद्धिक वर्ग को उस पर अंग्रेजी उपन्यासों का चमकीला रैपर लपेटने की पुरानी बीमारी है।

काक-वाणी का कड़वा सच

‘काक-वाणी’ का स्पष्ट मानना है कि हमारे देश में ‘कैमलोट’ नहीं, बल्कि ‘कैमल-लॉट’ (ऊंटों का झुंड) वाला हाल है। यहां हर कोई अपनी ही पीठ पर बैठे कूबड़ को छिपाने की कोशिश में दूसरे पर थूक रहा है। लेकिन धन्य हैं हमारे ये लिबरल पत्रकार, जो भारत की कड़क चाय में भी ‘कैमलोट’ की वाइन का स्वाद ढूंढ लेते हैं। जनता तो बेचारी आज भी पानी, सड़क और बिजली के मुद्दों में उलझी है, और उधर बुद्धिजीवी वर्ग संसद के गलियारों में ‘शूरवीरों’ के बख्तरबंद की काल्पनिक खड़खड़ाहट सुन रहा है। वाह री पत्रकारिता, तुम्हारी इस अद्भुत कल्पना को हमारा शत-शत नमन!


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कागा जी