वाह! क्या खबर छापी है विदेशी बाबू ने! ‘निकेई एशिया’ लिखता है कि भारत में विपक्ष के विरोध प्रदर्शनों ने मोदी सरकार पर ऐसा ‘दबाव’ बना दिया है कि सरकार के पसीने छूट रहे हैं। काक-वाणी के दफ्तर में यह खबर पढ़कर हमारे कौवे भी अपनी हंसी नहीं रोक पाए। हमें तो लगता था कि विपक्ष के प्रदर्शनों से केवल संसद की कैंटीन का समोसा संकट ही गहराता है, लेकिन विदेशी मीडिया को इसमें सीधे सत्ता परिवर्तन की चिंगारी दिख रही है। धन्य है यह दिव्य दृष्टि और धन्य हैं इसके देखने वाले!
विपक्ष की ‘भयानक’ हुंकार और थरथराता सिंहासन
रिपोर्ट की मानें तो जब राहुल गांधी और उनके साथी संसद परिसर में काली पट्टी बांधकर या तख्तियां लेकर खड़े होते हैं, तो साउथ ब्लॉक में भूकंप के झटके महसूस किए जाते हैं। विदेशी विश्लेषकों को लगता है कि विपक्ष का यह ‘अभूतपूर्व’ दबाव ही है, जिसके डर से गृहमंत्री और प्रधानमंत्री अपनी रणनीति बदलने को मजबूर हो रहे हैं। हकीकत यह है कि विपक्ष का यह दबाव ठीक वैसा ही है, जैसे परीक्षा से एक दिन पहले किसी बैकबेंचर छात्र पर ‘पढ़ने का दबाव’ होता है—शोर बहुत मचता है, रोना-धोना भी होता है, लेकिन अंत में परिणाम शून्य ही रहता है।
हवा-हवाई प्रदर्शन और एयर-कंडीशनर वाली क्रांति
जब संसद में विपक्ष के माननीय नेता जोर-जोर से नारे लगाते हैं, तो वाशिंगटन और टोक्यो में बैठे पत्रकारों को लगता है कि बस भारत में फ्रेंच क्रांति होने ही वाली है। उन्हें कौन समझाए कि इन नारों के पीछे की असली ऊर्जा संसद के बाहर मिलने वाली मीडिया फुटेज से आती है। प्रदर्शन खत्म होते ही सारे ‘क्रांतिकारी’ अपनी लग्जरी गाड़ियों के शीशे चढ़ाकर सीधे वातानुकूलित कमरों में ट्वीट टाइप करने बैठ जाते हैं। निकेई एशिया के पत्रकारों को शायद यह नहीं पता कि यहाँ ‘दबाव’ बनाने के लिए विपक्ष को पहले आपस में ‘चाय पार्टी’ करनी पड़ती है, जिसमें आधा समय तो इस बात पर लड़ने में निकल जाता है कि मंच पर कौन आगे बैठेगा।
दबाव सरकार पर है या विपक्ष के वजूद पर?
खैर, अंतरराष्ट्रीय मीडिया का काम ही है राई का पहाड़ बनाना। मोदी सरकार इस ‘भारी दबाव’ से इतनी डर गई है कि उसने अगले दो चुनावों की तैयारियां अभी से शुरू कर दी हैं, जबकि हमारा विपक्ष अभी तक पिछले चुनाव की हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने की कला में महारत हासिल कर रहा है। काक-वाणी का तो यही मानना है कि जब तक विदेशी मीडिया इस तरह विपक्ष की पीठ थपथपाता रहेगा, तब तक विपक्ष को अपनी जमीनी हकीकत का अहसास ही नहीं होगा। तो भाई, धरने देते रहिए, ‘दबाव’ बनाते रहिए और विदेशी अखबारों में अपनी बहादुरी के किस्से पढ़कर खुश होते रहिए!
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