सुदूर विंध्याचल के घने जंगलों के किनारे बसे एक छोटे से गाँव में देवकी नाम की एक गरीब महिला अपने नवजात शिशु के साथ रहती थी। देवकी का इस दुनिया में अपने बच्चे के अलावा कोई नहीं था, सिवाय एक नेवले के, जिसका नाम उसने ‘रामू’ रखा था। रामू केवल एक जानवर नहीं था, वह देवकी के सुख-दुख का साथी और उसके बच्चे का रक्षक था। रामू बच्चे के साथ ऐसे खेलता था मानो वह उसका सगा भाई हो। दोनों के बीच का यह अटूट प्रेम गाँव वालों के लिए भी कौतूहल का विषय था।
एक अनहोनी दोपहर और अटूट भरोसा
एक दोपहर देवकी को कुएँ से पानी भरने जाना था। घर में बच्चा सो रहा था। हमेशा की तरह, देवकी ने रामू की तरफ देखा और कहा, “रामू, मैं पानी लेकर अभी आती हूँ। मेरे बच्चे का ध्यान रखना।” रामू ने अपनी चमकीली आँखों से देवकी को देखा और बच्चे के पालने के पास बैठ गया, मानो उसने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर ली हो। देवकी घड़ा लेकर कुएँ की तरफ चली गई और पीछे रह गया केवल विश्वास का बंधन।
काल का आगमन और रक्षक की वीरता
देवकी के जाने के कुछ ही समय बाद, कमरे के कोने से एक विशाल और जहरीला काला नाग फुफकारते हुए बच्चे के पालने की ओर बढ़ने लगा। रामू ने जैसे ही खतरे को भांपा, उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसने बिना अपनी जान की परवाह किए नाग पर हमला कर दिया। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। नेवले ने अपनी पूरी ताकत लगा दी और अंततः सांप के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। बच्चे की जान बच चुकी थी, लेकिन संघर्ष में रामू का मुँह और शरीर खून से लथपथ हो गया था। वह थका हुआ लेकिन अपनी मालकिन का इंतजार करने के लिए दरवाजे पर आकर बैठ गया।
बिना विचारे किया गया प्रहार
जब देवकी पानी का घड़ा सिर पर रखकर लौटी, तो उसने दरवाजे पर रामू को खून से लथपथ देखा। यह देखकर देवकी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने बिना सोचे-समझे, गुस्से और डर के मारे यह मान लिया कि इस जंगली जानवर ने उसके मासूम बच्चे को मार डाला है। ममता की अंधी ममता और भयानक क्रोध में आकर, देवकी ने पानी से भरा भारी घड़ा पूरी ताकत से रामू के ऊपर दे मारा। घड़े के भारी प्रहार से रामू के प्राण पखेरू उड़ गए। उसकी वफादार आँखें बंद होने से पहले मानो अपनी मालकिन से पूछ रही थीं कि “मेरा क्या कसूर था?”
सच्चाई का सामना और जीवनभर का पछतावा
घबराकर देवकी रोती-बिलखती घर के अंदर दौड़ी। लेकिन अंदर का नजारा देखकर उसकी साँसें थम गईं। उसका बच्चा पालने में शांति से सो रहा था, और पास ही एक काले नाग का क्षत-विक्षत शरीर पड़ा था। देवकी को अपनी भूल का अहसास हुआ। उसने अपने सबसे वफादार दोस्त, अपने ‘रामू’ की हत्या कर दी थी, जिसने उसके बच्चे की जान बचाई थी। देवकी रामू के बेजान शरीर को अपनी छाती से लगाकर फूट-फूटकर रोने लगी, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
कहानी की नैतिक सीख
इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि क्रोध और जल्दबाजी में बिना सोचे-समझे लिया गया निर्णय हमेशा विनाशकारी होता है। किसी भी परिस्थिति में सच जाने बिना कोई कदम नहीं उठाना चाहिए, अन्यथा जीवनभर केवल पछतावा ही हाथ रहता है। जैसा कि कहा गया है – ‘बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय।’