विश्वास की जलती चिता: एक वफादार नेवले की दर्दभरी कहानी

एक अटूट बंधन की शुरुआत

एक शांत और खुशहाल गाँव में देवदत्त अपनी पत्नी रमा और अपने कुछ ही महीने के नवजात शिशु के साथ रहता था। उसी घर में ‘शेरू’ नाम का एक छोटा सा नेवला भी रहता था, जिसे देवदत्त ने अनाथ और घायल अवस्था में जंगल से उठाया था। रमा ने अपनी ममता की छांव देकर शेरू को पाल-पोसकर बड़ा किया था। वह उसे अपने बच्चे की तरह ही प्यार करती थी, उसे दूध पिलाती और उसका ख्याल रखती। समय के साथ, शेरू और उस नन्हे बच्चे के बीच एक अनूठा और गहरा स्नेह का रिश्ता बन गया था।

शंका का बीज और माँ की लाचारी

रमा के मन में नेवले के प्रति अगाध प्रेम तो था, लेकिन एक अज्ञात डर हमेशा उसके दिल के किसी कोने में छुपा रहता था। आखिर वह एक जंगली जानवर था, और माँ का दिल हमेशा अपने बच्चे को लेकर शंकालु रहता है। एक दोपहर, देवदत्त खेत पर काम करने गया हुआ था। रमा को कुएं से पानी लाने के लिए बाहर जाना था। बच्चा पालने में गहरी नींद सो रहा था। रमा ने जाने से पहले शेरू की तरफ देखा, उसकी वफादार आँखों में भरोसा तो था, लेकिन मातृत्व के अति-संवेदनशील डर ने उसे घेर लिया। उसने शेरू से कहा, “शेरू, मेरे बच्चे का ध्यान रखना। मैं अभी आती हूँ।” शेरू ने धीमे से अपनी पूंछ हिलाई, जैसे वह अपनी माँ को आश्वस्त कर रहा हो।

काल का आगमन और वीरता का प्रमाण

रमा के जाते ही घर के ठंडे फर्श पर एक भयानक हलचल हुई। एक कोने से एक जहरीला काला नाग रेंगता हुआ सीधे पालने की तरफ बढ़ने लगा। नाग की फुफकार सुनकर शेरू चौंक गया। उसने देखा कि साक्षात काल उसके छोटे भाई की ओर बढ़ रहा है। अपनी जान की परवाह किए बिना, शेरू बिजली की फुर्ती से नाग पर टूट पड़ा। दोनों के बीच एक भयानक और खूनी संघर्ष हुआ। शेरू छोटा था, लेकिन उसका साहस और अपने परिवार के प्रति समर्पण विशाल था। आखिरकार, उसने सांप के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और बच्चे की जान बचा ली। लड़ाई में उसका मुंह और पंजे खून से लथपथ हो गए थे। अपनी जीत और कर्तव्य पूरा होने की खुशी में, वह अपनी माँ (रमा) को यह बताने के लिए दरवाजे पर जाकर बैठ गया कि सब ठीक है।

एक भयानक भूल और जीवनभर का विलाप

जैसे ही रमा पानी का घड़ा सिर पर रखकर लौटी, उसकी नजर दरवाजे पर बैठे शेरू पर पड़ी। उसके चेहरे और पैरों पर ताजा खून लगा देखकर रमा के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसके दिमाग में केवल एक ही भयानक विचार कौंधा—”इस जानवर ने मेरे मासूम बच्चे को मार डाला!” गुस्से, सदमे और पागलपन में उसने बिना सोचे-समझे पानी से भरा भारी घड़ा पूरी ताकत से शेरू के ऊपर दे मारा।

घड़े की मार इतनी घातक थी कि शेरू की रीढ़ की हड्डी टूट गई। दर्द से तड़पते हुए, उसने अपनी अंतिम सांस लेते समय बड़ी ही मर्मस्पर्शी और बेकसूर आँखों से अपनी माँ रमा को देखा, जैसे वह मूक भाषा में पूछ रहा हो, “माँ, मेरा क्या कसूर था?” और उसने दम तोड़ दिया।

पागलों की तरह रोती हुई रमा अंदर भागी। कमरे का नजारा देखकर उसका दिल थम गया। पालने में उसका बच्चा सुरक्षित सो रहा था और मुस्कुरा रहा था, जबकि पालने के ठीक नीचे एक विशाल काले सांप की कटी-फटी लाश पड़ी थी। सच सामने आते ही रमा पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। उसने अपने रक्षक और वफादार बेटे को अपने ही हाथों मार डाला था। वह दौड़कर बाहर आई और शेरू के बेजान शरीर को अपनी छाती से लगाकर फूट-फूटकर रोने लगी, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

कहानी की सीख

सीख: इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जल्दबाजी और अत्यधिक क्रोध में लिया गया निर्णय हमेशा विनाशकारी साबित होता है। किसी भी परिस्थिति में बिना सोचे-समझे और बिना सच्चाई जाने कोई कदम नहीं उठाना चाहिए, क्योंकि पलभर का गुस्सा पूरे जीवन का पछतावा बन जाता है।

कागा जी