व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का नया सिलेबस: यूनेस्को अवार्ड से लेकर नासा की दिवाली तक का सच

प्रणाम पाठकों! काक-वाणी के विशेष खंड ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ में आपका स्वागत है। हमारे देश में दो तरह के विश्वविद्यालय हैं। एक वो जहाँ जाने के लिए कठिन परीक्षा देनी पड़ती है, और दूसरा वो जो आपके फ़ोन में सुबह 5 बजे खुद-ब-खुद ‘गुड मॉर्निंग’ की चमकदार गुलाब की तस्वीरों के साथ खुल जाता है। इस दूसरे विश्वविद्यालय के कुलपतियों और प्रोफेसरों (जिन्हें हम प्यार से ‘पारिवारिक ग्रुप के एडमिन’ कहते हैं) ने ज्ञान की ऐसी गंगा बहाई है कि बेचारा सच आज कोने में बैठकर रो रहा है। आइए, आज हम इस ज्ञानगंगा के कुछ वायरल सच और झूठ का ‘कौआ-परीक्षण’ (सटीक फैक्ट चेक) करते हैं।

१. यूनेस्को ने घोषित किया सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान: सत्य या परम सत्य?

हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर हमारे व्हाट्सएप ग्रुपों में एक अत्यंत ‘गौरवशाली’ संदेश तैरता है कि यूनेस्को (UNESCO) ने भारत के राष्ट्रगान को दुनिया का सबसे बेहतरीन राष्ट्रगान घोषित किया है। जब हमने इसकी पड़ताल करने के लिए यूनेस्को के मुख्यालय फोन लगाया (काल्पनिक रूप से), तो पता चला कि उन्हें तो यह भी नहीं पता कि वे राष्ट्रगानों की कोई प्रतियोगिता भी आयोजित करते हैं! सच तो यह है कि हमारे राष्ट्रगान को किसी बाहरी सर्टिफिकेट की जरूरत ही नहीं है, लेकिन हमारे व्हाट्सएप के जांबाजों को जब तक विदेशी मुहर न मिले, उनकी सुबह की चाय हजम नहीं होती।

२. नासा द्वारा खींची गई दिवाली की वो ‘चमकती’ तस्वीर

दिवाली की अगली सुबह सोशल मीडिया पर एक रंग-बिरंगी, जगमगाती भारत के नक्शे की तस्वीर वायरल होती है, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि इसे नासा (NASA) के उपग्रह ने विशेष रूप से खींचा है। इस तस्वीर को देखकर लगता है मानो भारत में दिवाली नहीं, बल्कि कोई सतरंगी लेजर शो चल रहा था। सच यह है कि वह तस्वीर एक साधारण थ्री-डी कंप्यूटर ग्राफिक्स इमेज है, जिसे सालों पहले किसी कलाकार ने केवल आबादी का घनत्व दिखाने के लिए बनाया था। नासा के वैज्ञानिक खुद परेशान हैं कि वे हर साल अंतरिक्ष से भारत की सिर्फ दिवाली ही क्यों देख पाते हैं, प्रदूषण क्यों नहीं?

३. १० लोगों को भेजें और तुरंत चमत्कार देखें

“इस संदेश को तुरंत डिलीट न करें। इसे ११ लोगों को भेजें, शाम तक अच्छी खबर मिलेगी। एक व्यक्ति ने इसे नजरअंदाज किया तो उसकी भैंस भाग गई!” ऐसे संदेशों के पीछे जो वैज्ञानिक लॉजिक है, उसे आज तक नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया है। यह पूरी तरह से एक मानसिक स्कैम है। अगर केवल १० लोगों को संदेश फॉरवर्ड करने से तकदीर बदलती, तो आज देश के सारे बेरोजगार युवा व्हाट्सएप पर फॉरवर्ड की दुकानें खोलकर करोड़पति बन चुके होते।

काक-वाणी की अंतिम सलाह

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के प्यारे छात्रों, ज्ञान बांटना पुण्य का काम है, लेकिन बिना सोचे-समझे कचरा फॉरवर्ड करना मानसिक प्रदूषण फैलाना है। अगली बार जब आपके फूफाजी ग्रुप में ‘फ्री रिचार्ज’ का लिंक भेजें, तो उस पर क्लिक करने के बजाय उन्हें एक कप कड़क चाय पिलाएं। अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करें, क्योंकि दिमाग भगवान ने मुफ्त में दिया है, इसके लिए किसी इंटरनेट पैक की जरूरत नहीं पड़ती!

कागा जी