व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का ज्ञानोत्सव: जब नासा और यूनेस्को ने भारतीय फॉरवर्ड्स के आगे घुटने टेके

स्वागत है आपका ‘काक-वाणी’ के विशेष स्तंभ ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ में। आज हम बात करेंगे उस महान ज्ञान की गंगा की, जो रोज सुबह आपके फोन की घंटी बजाकर बहती है। हमारे देश में सत्य के दो ही स्रोत बचे हैं—एक तो साक्षात ईश्वर और दूसरे हमारे फूफा जी द्वारा भेजा गया व्हाट्सएप फॉरवर्ड। आधुनिक विज्ञान तो बेचारा बिना वजह ही लैब में रात-दिन एक कर रहा है, असली शोध तो सुबह की चाय की चुस्कियों के साथ ‘फॉरवर्डेड एज़ रिसीव्ड’ के टैग के साथ पूरा हो जाता है।

यूनेस्को का अंतहीन राष्ट्रगान प्रेम

पिछले एक दशक से हर १५ अगस्त और २६ जनवरी को यूनेस्को (UNESCO) अचानक गहरी नींद से जागता है और भारत के राष्ट्रगान को “दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान” घोषित कर देता है। यूनेस्को के अधिकारी खुद परेशान हैं कि उन्होंने यह घोषणा कब और किस मीटिंग में की थी, लेकिन हमारे व्हाट्सएप ग्रुप के ‘एडमिन’ इस सच को मानने को तैयार नहीं हैं। अगर यूनेस्को के पास इस पुरस्कार का कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं है, तो यह उनकी प्रशासनिक लापरवाही है, हमारे फूफा जी के ज्ञान की कमी नहीं!

नासा का दिवाली प्रेम और अंतरिक्ष में गूंजता ‘ओम’

दूसरा सबसे बड़ा वैज्ञानिक सच जो नासा (NASA) दुनिया से छुपा रहा था, उसे हमारे व्हाट्सएप वैज्ञानिकों ने खोज निकाला है। हर दिवाली पर अंतरिक्ष से ली गई भारत की वह सतरंगी चमकीली तस्वीर, जो असल में किसी नौसिखिए ग्राफिक डिजाइनर ने फोटोशॉप पर बनाई थी, उसे नासा की आधिकारिक सैटेलाइट इमेज बताकर धड़ल्ले से शेयर किया जाता है। हद तो तब हो गई जब यह दावा किया गया कि नासा ने सूरज की आवाज रिकॉर्ड की है और उसमें से ‘ओम’ की ध्वनि सुनाई दे रही है। अब नासा वाले अपने हेडफोन साफ कर रहे हैं कि आखिर उन्हें यह आवाज क्यों नहीं सुनाई दी।

किडनी स्टोन से लेकर कोरोना तक: इलाज सिर्फ दो बूंद नींबू में

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के डॉक्टरों के पास हर असाध्य बीमारी का अचूक इलाज है। कैंसर हो या कोरोना, बस गर्म पानी में नींबू निचोड़िए, थोड़ा सेंधा नमक मिलाइए और पी जाइए। डॉक्टर और अस्पताल तो बस मल्टीनेशनल कंपनियों की साजिश हैं, असली चिकित्सा तो रसोई के मसाले के डिब्बे में बंद है। अल्बर्ट आइंस्टीन और स्टीफन हॉकिंग की आत्माएं भी स्वर्ग में सिर पकड़कर बैठी होंगी जब वे देखती हैं कि उनके सिद्धांतों को खारिज कर लोग व्हाट्सएप पर ‘प्लास्टिक वाले कुरकुरे’ का लाइव टेस्ट दिखा रहे हैं।

फॉरवर्ड करने से पहले सोचें

इस वायरल दुनिया की कड़वी सच्चाई यह है कि उंगली चलाकर ‘सेंड’ बटन दबाने में जितनी ऊर्जा लगती है, दिमाग चलाकर तथ्य जांचने में उससे थोड़ी अधिक लगती है। इसलिए, अगली बार जब आपके पास “इसे तुरंत ११ लोगों को भेजें, शाम तक बड़ी खुशखबरी मिलेगी” वाला संदेश आए, तो उसे वहीं रोक दें। यकीन मानिए, समाज के लिए इससे बड़ी खुशखबरी और कोई नहीं हो सकती।

कागा जी