भैया, हमारे देश के संतों, नेताओं और विचारकों का एक गजब का हुनर है। जैसे ही ये सात समंदर पार अमेरिका की धरती पर कदम रखते हैं, इनके भीतर का ‘विश्वगुरु’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का कीड़ा अचानक कुलबुलाने लगता है। भारत में चाहे जो भी राग अलापा जाए, लेकिन अमेरिकी धरती पर कदम रखते ही सबके सुर ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ वाले हो जाते हैं।
हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत जी ने अमेरिका में एक ऐसा बयान दे डाला, जिससे हमारे देश के ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ के होनहार छात्रों के फेफड़े गले में आ गए हैं। भागवत जी ने फरमाया, “जो हिंदू भारत में मुसलमानों के लिए जगह नहीं देखता, वह हिंदू ही नहीं है।” अब बताइए, भला यह भी कोई बात हुई? सीधे सर्टिफिकेट ही रद्द कर दिया!
आईटी सेल में छाई ‘सन्नाटे की लहर’
इस बयान के बाद हमारे उन बेचारे कीबोर्ड शूरवीरों का क्या होगा, जो सुबह की चाय से लेकर रात के डिनर तक सोशल मीडिया पर ‘धर्म खतरे में है’ का कीर्तन करते हैं? कल तक जो लोग हर बात पर ‘पाकिस्तान जाओ’ का मुफ्त टिकट बांट रहे थे, आज उन्हें खुद के हिंदू होने पर ही संदेह होने लगा है। आखिर संघ प्रमुख ने सीधे उनके ‘हिंदू’ होने की परिभाषा ही बदल दी!
लगता है सात समंदर पार की हवा में कुछ ऐसा ‘धर्मनिरपेक्ष’ रसायन होता है जो सारे ‘गर्म खून’ को अचानक ठंडा कर देता है। भारत में जो मुद्दे चुनाव जिताने और ध्रुवीकरण के काम आते हैं, अमेरिका में वे अचानक ‘ग्लोबल इमेज’ के लिए खतरा बन जाते हैं। वहां जाकर हमारे नेताओं को अचानक याद आता है कि अरे, हम तो सहिष्णुता के ब्रांड एंबेसडर हैं!
भूगोल बदलते ही बदल जाता है हिंदुत्व का व्याकरण
यह भी कमाल की कला है। भारत में हर दूसरे दिन भोजन, पहनावे और नागरिकता पर बहस गर्म रहती है, लेकिन जैसे ही न्यूयॉर्क या वाशिंगटन का वीजा लगता है, वैसे ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा समावेशी देश बन जाता है। वहां जाकर बताया जाता है कि मुसलमानों के बिना तो हिंदुत्व अधूरा है।
अब बेचारे स्थानीय कार्यकर्ताओं की दुविधा समझिए। वे सुबह शाखा में लाठी घुमाते वक्त किस मंत्र का जाप करें? ‘हिंदू राष्ट्र’ का या भागवत जी के इस ‘अमेरिकी ज्ञान’ का?
काक-वाणी का तो सीधा मानना है कि अब विचारों में भी ‘एक्सपोर्ट क्वालिटी’ और ‘डोमेस्टिक क्वालिटी’ का अंतर आ गया है। एक्सपोर्ट वाला माल बिल्कुल शुद्ध, मीठा और सहिष्णु होता है, ताकि गोरे साहब खुश रहें। वहीं डोमेस्टिक वाला माल थोड़ा तीखा और मसालेदार होता है ताकि देश में वोट पकते रहें। खैर, जब तक अमेरिका का वीजा ऑन रहेगा, तब तक ऐसी ‘सद्भावना’ बरसती रहेगी। भारत लौटते ही फिर से पुरानी पिच पर बैटिंग शुरू हो जाएगी। कांव-कांव!
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