बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से सुंदर गाँव में माधव नाम का एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी रमा और अपने नवजात बेटे के साथ रहता था। गरीबी के बावजूद उनका छोटा सा संसार खुशियों से भरा था। उसी घर में ‘चीकू’ नाम का एक छोटा सा नेवला भी रहता था। माधव ने उसे जंगल में अनाथ और घायल अवस्था में पाया था। रमा ने उसे अपनी ममता से सींचा और अपने सगे बच्चे की तरह ही पाला-पोसा। चीकू और उनका बच्चा एक साथ ही बड़े हो रहे थे, दोनों में गहरा प्रेम था।
एक दोपहर की भूल
एक दिन रमा घर के काम निपटाकर कुएं से पानी भरने जाने लगी। उसने माधव से कहा, “स्वामी, मैं पानी लेने जा रही हूँ। हमारा बच्चा सो रहा है, कृपया जरा उसका ध्यान रखिएगा।” माधव ने मुस्कुराकर हामी भर दी। लेकिन रमा के जाने के कुछ ही समय बाद, माधव को गाँव के जमींदार के यहाँ से भिक्षा के लिए बुलावा आ गया। माधव ने सोचा कि चीकू तो घर पर है ही, वह बच्चे का ध्यान रखेगा। चीकू पर अटूट भरोसा करके माधव घर का दरवाजा बंद कर बाहर चला गया।
माधव के जाने के कुछ ही पलों बाद, एक विषैला काला सांप कहीं से रेंगता हुआ कमरे में दाखिल हुआ। वह सीधा सोए हुए बच्चे के पालने की तरफ बढ़ने लगा। पालने के पास पहरा दे रहे चीकू की नजर जैसे ही सांप पर पड़ी, उसका रक्षक रूप जाग उठा। अपने छोटे भाई समान बच्चे को बचाने के लिए चीकू बिना अपनी जान की परवाह किए सांप पर टूट पड़ा। दोनों के बीच भयंकर लड़ाई हुई। अंततः, साहसी चीकू ने सांप के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और बच्चे की जान बचा ली। लड़ाई में चीकू का मुंह और पैर सांप के खून से पूरी तरह सन गए थे।
जल्दबाजी का भयानक अंजाम
अपनी जीत की खुशी में और अपनी माँ रमा से शाबाशी पाने की चाह में, चीकू दौड़कर घर के दरवाजे पर बैठ गया। वह अपनी पूंछ हिलाते हुए रमा का इंतजार करने लगा। तभी रमा सिर पर पानी का घड़ा रखकर वापस लौटी। जैसे ही उसकी नजर दरवाजे पर बैठे चीकू पर पड़ी, उसने देखा कि चीकू का पूरा मुंह खून से लथपथ है।
रमा का दिल दहल गया। ममता के डर और बिना सोचे-समझे उसके दिमाग में पहला विचार यही आया कि इस जंगली जानवर ने उसके मासूम बच्चे को मार डाला है। क्रोध, दुःख और प्रतिशोध में अंधी होकर, रमा ने बिना सोचे-समझे अपने सिर पर रखा पानी से भरा भारी घड़ा पूरी ताकत से चीकू के ऊपर पटक दिया। भारी घड़े के प्रहार से उस बेकसूर और वफादार चीकू ने तड़प-तड़पकर मौके पर ही दम तोड़ दिया।
पछतावे के आंसू
चीकू को मारने के बाद, रमा रोती और चिल्लाती हुई घर के अंदर भागी। लेकिन कमरे के अंदर का दृश्य देखते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका बच्चा पालने में सुरक्षित सो रहा था और उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी। पालने के ठीक नीचे एक विशाल काले सांप की कटी हुई लाश पड़ी थी।
रमा को पल भर में अपनी भयानक भूल का अहसास हो गया। उसने उस वफादार जीव को मार डाला था जिसने अपनी जान की बाजी लगाकर उसके बेटे की रक्षा की थी। जब माधव घर लौटा, तो उसने रमा को चीकू के बेजान शरीर को अपनी छाती से लगाकर फूट-फूटकर रोते हुए पाया। रमा चिल्ला-चिल्लाकर चीकू से माफी मांग रही थी, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। उनका प्यारा चीकू हमेशा के लिए गहरी नींद सो चुका था।
कहानी की नैतिक शिक्षा (Moral of the Story)
बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय।
इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि अत्यधिक क्रोध और जल्दबाजी में लिया गया निर्णय हमेशा विनाशकारी होता है। किसी भी परिस्थिति में पूरी सच्चाई जाने बिना कोई भी कदम नहीं उठाना चाहिए। क्षण भर का गुस्सा और अविश्वास जीवनभर का असहनीय पछतावा बन सकता है।