बॉलीवुड में जब भी रोमांस, ड्रामा और गानों की बात होती है, तो हम सब झूम उठते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब परदे पर दो देशों की जंग दिखाई जाती है, तो उसके पीछे सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि गहरी कूटनीति छिपी होती है? हाल ही में ‘टीआरटी वर्ल्ड’ (TRT World) की एक रिपोर्ट ने सोशल मीडिया पर खलबली मचा दी है। इस रिपोर्ट में पूछा गया है कि क्या बॉलीवुड की फिल्में भारत की बदलती चीन नीति की कहानी बयां कर रही हैं? ‘काक-वाणी’ के इस तीखे और मनोरंजक विश्लेषण में आइए जानते हैं इस फिल्मी-कूटनीतिक कॉकटेल का पूरा सच!
‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ से सीधे सीमा पर तकरार का सफर
एक जमाना था जब चेतन आनंद की कालजयी फिल्म Haqeeqat ने 1962 के युद्ध के दर्द को परदे पर उतारा था। उस वक्त के सिनेमा में एक भावुकता थी, एक धोखा खाने का दर्द था और शांति की अपील थी। इसके बाद सालों बाद कबीर खान की ‘ट्यूलाइट’ आई, जिसने जंग के बीच भी भाईचारे और मानवीय रिश्तों को टटोलने की कोशिश की। लेकिन बदलते समय के साथ, भारत का मूड भी बदला और हमारे सिनेमा का रुख भी। अब ड्रैगन को परदे पर केवल एक पड़ोसी नहीं, बल्कि एक चालाक और आक्रामक प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश किया जाने लगा है।
‘पलटन’ के दौर में बदला बॉलीवुड का लहजा
जेपी दत्ता की फिल्म Paltan Movie इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनी। इस फिल्म में चीनी सैनिकों के साथ आंख में आंख मिलाकर बात करने वाले और उन्हें पीछे धकेलने वाले भारतीय जांबाजों को दिखाया गया। यह फिल्म केवल बॉक्स ऑफिस के लिए नहीं बनी थी, बल्कि यह भारत की उस नई और आक्रामक विदेश नीति का प्रतीक थी, जो कहती है—”हम आंखें झुकाएंगे नहीं, आंखें मिलाएंगे।” डोकलाम विवाद और गलवान घाटी की हिंसक झड़प के बाद तो जैसे बॉलीवुड ने अपनी स्क्रिप्ट ही बदल दी है। अब फिल्मों में कूटनीतिक संयम की जगह सीधे एक्शन और राष्ट्रवाद का तड़का लगाया जा रहा है। आज का युवा दर्शक भी परदे पर ‘दबंग’ भारत देखना पसंद करता है।
क्या यह सॉफ्ट पावर का नया हथियार है?
दुनियाभर के भू-राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि सिनेमा किसी भी देश की ‘सॉफ्ट पावर’ को मजबूत करने का सबसे बड़ा जरिया है। जब बॉलीवुड की फिल्मों में चीन की विस्तारवादी नीतियों को चुनौती दी जाती है, तो यह वैश्विक स्तर पर भारत के मजबूत होते नैरेटिव को दर्शाता है।
तो अगली बार जब आप थिएटर में बैठकर किसी देशभक्ति फिल्म पर सीटियां बजाएं, तो समझ जाइएगा कि यह सिर्फ मनोरंजन नहीं है। यह परदे के पीछे से चल रही उस शह और मात के खेल का हिस्सा है, जिसे कूटनीति कहा जाता है। ‘काक-वाणी’ का तो यही मानना है कि अब हमारा सिनेमा सिर्फ दिल नहीं जीतता, बल्कि सरहद के पार दुश्मनों के हौसले भी पस्त करता है!
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