२५ सालों की ‘तपस्या’ पर विरोध के बादल: जर्मन चश्मे का नया मोतियाबिंद!

वाह! पूरे २५ साल! एक चौथाई सदी से हमारे देश की राजनीति में एक ही नाम की गूंज है, एक ही चेहरा है और एक ही विकास की गारंटी है। जैसे ही साहेब ने अपनी राजनीतिक तपस्या के २५ साल (मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री पद तक) पूरे किए, हमारे दरबारी और ढोल-नगाड़े वाले आरती की थाल सजाकर तैयार ही खड़े थे कि तभी सात समंदर पार बैठे डीडब्ल्यू (DW) वालों ने अपनी दूरबीन तान दी। उन्होंने दूरबीन से देखा और पूरी दुनिया में चिल्ला उठे—”अरे देखो, वहां तो जश्न के सूरज पर विरोध के काले बादल छाए हैं!” अब इन नासमझ फिरंगियों को कौन समझाए कि हमारे देश में बिना बादलों के तो सावन भी नहीं आता, और बिना विरोध के हमारे साहेब की चाय भी हजम नहीं होती!

बादल नहीं साहेब, यह तो ‘अमृत काल’ का कोहरा है!

जर्मन मीडिया को लगता है कि २५ साल के इस स्वर्णिम सफर में अगर चंद लोग बैनर-पोस्टर लेकर सड़कों पर खड़े हो गए, तो साहेब का ‘विकास रथ’ पंचर हो जाएगा। अरे भाई, यह भारत है, कोई बर्लिन की शांत सड़क नहीं। यहाँ विरोध प्रदर्शन कोई विघ्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र का असली सत्तू है। जब तक हर नुक्कड़ पर दो-चार लोग सरकार को पानी पी-पीकर कोस न लें, तब तक हमें खुद यकीन नहीं होता कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सांस ले रहे हैं। लेकिन विदेशी पत्रकारों को तो बस ‘क्लाउड’ देखने की बीमारी है। वैसे, यह विरोध का बादल नहीं है डीडब्ल्यू वालों, यह तो हमारे अमृत काल का वह चमकीला कोहरा है जिसमें आम जनता को अपना भविष्य और सरकार को अपनी कमियां, दोनों ही दिखाई नहीं दे रही हैं।

सच्चा लोकतंत्र वही, जहां जश्न और धरना साथ-साथ चले

हमारी ‘काक-वाणी’ तो इसे एक बहुत बड़ी उपलब्धि मानती है। सोचिए, एक तरफ देश के सबसे शक्तिशाली नेता के २५ साल का भव्य उत्सव मन रहा है, टीवी चैनलों पर ‘न भूतो न भविष्यति’ के राग अलापे जा रहे हैं, और दूसरी तरफ जनता सड़कों पर अपनी डफली बजा रही है। इससे सुंदर संतुलन और क्या हो सकता है? साहेब अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ रहे हैं और प्रदर्शनकारी अपने विरोध पथ पर। यह कोई अशांति नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का वो जुगलबंदी संगीत है जिसे समझने के लिए जर्मन बुद्धिजीवियों को अभी कई जन्म लेने पड़ेंगे।

काग भुशुंडि की अंतिम टिप्पणी

अंत में, ‘काक-वाणी’ की सलाह यही है कि विरोधियों को चिल्लाने दीजिए और साहेब को आगे बढ़ने दीजिए। २५ साल तो बस एक झांकी है, अभी तो पचासा पूरा करना बाकी है। तब तक विदेशी मीडिया अपने चश्मे का नंबर बदलवा ले, क्योंकि भारत में विरोध के बादल कभी बरसते नहीं, वे सिर्फ गरजते हैं और गरज कर साहेब की रैलियों के लिए मौसम को और सुहाना बना देते हैं।


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कागा जी