आगरा के एक शांत कोने में रामू नाम का एक वृद्ध और दृष्टिहीन बुनकर रहता था। अपनी स्वर्गीय बेटी की याद में उसने वर्षों की कठिन मेहनत से एक अद्भुत रेशमी शॉल बुनी थी। उस शॉल का हर धागा उसकी बेटी के प्रति उसके असीम प्रेम और आंसुओं से सिंचा हुआ था। एक दिन, जब शाही सिपाही नगर में गश्त लगा रहे थे, उनकी नज़र रामू की उस दिव्य शॉल पर पड़ी। शॉल की अकल्पनीय सुंदरता देखकर सिपाहियों को लगा कि ऐसा दुर्लभ वस्त्र किसी गरीब का नहीं हो सकता। वे उस पर शाही खजाने से रेशम चोरी करने का झूठा आरोप लगाकर उसे सम्राट अकबर के दरबार में घसीट लाए।
दरबार में दुख का साया
दरबार में शॉल को देखकर सम्राट अकबर भी हैरान रह गए। वह सचमुच किसी अमूल्य रत्न जैसी प्रतीत हो रही थी। सेनापति ने कहा, “जहाँपनाह! यह वृद्ध ढोंगी है, इसने शाही खजाने से कीमती रेशम चुराकर यह शॉल बनाई है।” रामू फूट-फूटकर रोने लगा और बोला, “हुज़ूर! यह चोरी की नहीं, मेरी मृत बेटी की यादों की धरोहर है। मैंने अपनी बंद आँखों से, अपने दिल के अहसास से इसे बुना है।” अकबर असमंजस में थे कि क्या एक दृष्टिहीन व्यक्ति बिना देखे इतनी बारीक और खूबसूरत बुनाई कर सकता है?
बीरबल की चतुर परीक्षा
दरबार में सन्नाटा छाया था, लेकिन बीरबल ने बूढ़े पिता की आँखों से बहते आंसुओं में छिपे सच्चे दर्द को महसूस कर लिया। बीरबल ने सम्राट से न्याय करने के लिए थोड़ा समय माँगा। उन्होंने तुरंत शाही खजाने से दो वैसी ही दिखने वाली रेशमी शॉलें मंगवाईं और उन्हें रामू की शॉल के साथ रख दिया। बीरबल ने रामू से कहा, “बाबा, यदि तुमने यह शॉल स्वयं बुनी है, तो बिना इसे छुए अपनी शॉल पहचान कर दिखाओ।”
सभी दरबारी हैरान थे कि एक अंधा व्यक्ति बिना स्पर्श किए कपड़ा कैसे पहचानेगा? रामू ने नम आँखों से थोड़ा जल माँगा। उसने जल की कुछ बूंदें तीनों शॉलों पर छिड़कीं और हवा में उठने वाली महक को गहराई से महसूस किया। फिर वह एक शॉल के सामने घुटनों के बल बैठ गया और रोते हुए बोला, “जहाँपनाह, यह मेरी शॉल है! इसमें से चमेली के उन फूलों की महक आ रही है, जो मेरी बेटी को बेहद प्रिय थे और जिन्हें मैंने धागे रंगते समय मिलाया था।”
न्याय और प्रेम की जीत
बीरबल ने मुस्कुराते हुए अकबर से कहा, “जहाँपनाह! यही सच है। शाही शॉल में कीमती इत्र की महक हो सकती है, लेकिन एक पिता के निश्चल प्रेम और प्राकृतिक फूलों की यह सोंधी महक केवल इसी शॉल में है।” बीरबल की इस चतुर और संवेदनशील परख ने पूरे दरबार का दिल जीत लिया। अकबर की आँखें भी भर आईं। उन्होंने रामू से क्षमा माँगी, उसकी शॉल सम्मानपूर्वक लौटाई और उसकी कला के लिए उसे सौ स्वर्ण मुद्राएं भेंट कीं।
नैतिक शिक्षा: सच्चा न्याय केवल आँखों से देखे सबूतों से नहीं, बल्कि दिल की संवेदना और बुद्धिमत्ता से होता है। प्रेम और कला की कीमत दुनिया की किसी भी धन-दौलत से कहीं अधिक होती है।