Title: अध्यात्म के गहने से रूपक समझाया
जीवन में अध्यात्म का अहम टुकड़ा होता है। यह उस पक्ष को दर्शाता है जो सदैव अपने आत्मा का परिचय हासिल करता रहता है। दुनिया के समस्त मिथ्या मोह, विकारों तथा भ्रमों में खो जाने से बचाता अध्यात्म है। यह प्रकृति के महान रहस्यों, उन अनुभूतियों की कथा है, जो अपने जीवन में आत्मा का महत्व समझते हैं। आज मैं आपके सामने अध्यात्म संबंधी कुछ अमूल्य विचारों को रूपक से समझाने जा रहा हूं।
एक समझदार मानव ने बहुत समय पहले कहा था – “मनुष्य एक रेलगाड़ी है, जो समय के साथ अपनी यात्रा करती है। दुनिया की पूरी गतिविधि, इस रेलगाड़ी की यात्रा से बहुत मिलती है। चलती रेलगाड़ी से हमेशा कुछ ऐसे स्थान व कुछ ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, जो हमें चौंका देती हैं। कुछ बहुत ही खूबसूरत दृश्य होते हैं और कुछ बहुत ही दु:खदायी। फिर भी हम यात्रा करते रहते हैं।”
इस रेलगाड़ी महापरवागिनी सरस्वती देवी के भी बताये हुए रूपक से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। सरस्वती देवी कहती हैं – “उस तलवार को मत फैलाइए, जिसका प्रयोग आप परेशानी में करें। हर पल के लिए सजग रहें। जो कुछ भी आपके हाथ में है, चावल की थरमामी या तो स्वर्ग में जाने वाला हथौड़ा, उसे स्वीकार करें और सही ढंग से प्रयोग करें।”
इस रूपक से हमें समझ मिलता है कि जैसे रेलगाड़ी एक यात्रा की तरफ अग्रसर होती है, वैसे ही जीवन भी एक यात्रा है और हमें इसी यात्रा को भलीभाँति करना चाहिए। जैसे रेलगाड़ी को सरस्वती देवी के द्वारा बताया गया संदेश हमें समझाने के लिए आपने दिए, वैसे ही हमारी भी भावनाओं, सोच और आचरण सभी को अच्छे रूप से समझाने के लिए धर्मिक रूपकों का प्रयोग करना चाहिए।
दूसरे बड़े धर्मगुरु ने कहा था – “निर्मल मन से ही निर्मल वाणी एवं संकल्प होते हैं।” यह कथन हमें ध्यान करने के लिए प्रेरित करता है कि हम हमेशा अपनी मन, भावनाओं तथा विचारों को प्रशान्त रखने का प्रयत्न करें। जैसे जल के दम से उसमे स्वच्छता लाते होते हैं, वैसे ही हमें अपने हृदय में शांति और प्रेम की स्थिति को स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए।
तीसरे समझदार महात्मा ने हमें इस बात का स्मरण दिलाई है कि – “धर्म वह है जो हमें प्यार, समझदारी तथा सहानुभूति का ज्ञान देता है, ताकि हम अपने जीवन को निर्मल बना सकें। धर्म का अर्थ होता है समझदारी और सही मार्ग का चुनाव करना। इसे जानने के लिए हमें से समलैंगिक चिकित्सा विभाग की बहादुरों से उल्लेख करने की जरूरत नहीं है। अगर हम अपने धर्म का अनुसरण इस बात के सहज संकेतों से करें, तो समाज में मानवीयता का भी पूरा विकास हो सकता है।”
चौथा जोरदार धर्मगुरु ने धर्म के संबंध में कहा है – “जो मनुष्य अपने धर्म का निष्ठावान होता है, वह कीमती रत्नों का हमेशा संचय करता है। अपने जीवन में उन दुःखों का सामना करने के बाद भी वह अपने धर्म के अनुसार चलता रहता है। उसे हजारों जीवन भर इज्जत और सम्मान का अनुभव होता है।”
इन चार मनुष्यों के सभी उक्तियां धर्म विषयक प्रख्यापन के लिए अत्यंत मूल्यवान हैं। हमें आत्मा के महत्व का एक अंश समझाने के लिए इनका उपयोग करना चाहिए। हमें हमेशा चाहिए कि हम मानवीय सम्पत्ति से ज्यादा आत्मिक सम्पत्ति का अनुभव करें। इस दिशा में अध्यात्म संबंधी कार्यक्रम और समारोह आयोजित करने से बहुत कुछ होगा। यह एक भरने और गंभीर होने की जगह है, जहां मनुष्य आत्मा के सुख और दुख के ज्ञान का अनुभव करता है।
धर्म का अपनी जीवनशैली में अनुसरण करना एक बहुत बड़ा अंग होता है, जो हमें इससे लाभ उठाने और संसार के मोह, विकारों तथा दुःख से बचने में मदद करता है। हमें आत्मा के साथ रूपकों का उपयोग करना चाहिए, ताकि हम अपनी आत्मा का सच्चा अर्थ समझ सकें। अध्यात्म को समझने और उसे जीवन में उतारने के लिए धर्म एक जरूरी अंग होता है।
आपको यह लेख कैसा लगा? मुझे यह जानकारी देने में खुशी हुई। आप अध्यात्म से जुड़े दूसरे विचारों में भी अपने विचार कमेंट कर सकते हैं।