वाह! क्या बात है! राजनीति की तपती धूप में जब आम नेता सिर्फ बयानों के बाण छोड़ते हैं, तब तमिलनाडु के ‘सिंघम’ यानी के. अन्नामलाई साहब ने कलम उठा ली है। ‘द प्रिंट’ की ताजा खबर के मुताबिक, तमिलनाडु भाजपा के अध्यक्ष की एक नई किताब आई है। इसमें “उम्मीद जब निराशा से मिलती है” जैसे गम्भीर और दार्शनिक विषयों पर ज्ञान का महासागर उमड़ा है। किताब में छात्र आंदोलनों से लेकर देश की आंतरिक ‘फॉल्ट लाइन्स’ यानी दरारों तक पर गहरा मंथन किया गया है। ‘काक-वाणी’ की तरफ से इस महान साहित्यिक क्रांति के अग्रदूत को शत-शत नमन!
पूर्व आईपीएस की नजर से लोकतंत्र का दर्द!
एक पूर्व आईपीएस अधिकारी का छात्र आंदोलनों और देश की राजनीतिक दरारों पर लिखना ठीक वैसा ही है जैसे कोई बिल्ली शाकाहार पर शोध पत्र प्रस्तुत करे! जो साहब कल तक खाकी वर्दी में आंदोलनों को ‘कानून-व्यवस्था का संकट’ बताकर वाटर कैनन और लाठियों से निपटाते थे, आज वही राजनेता का चोला पहनकर छात्र आंदोलनों के पीछे की “उम्मीद और निराशा” समझा रहे हैं। सचमुच, वर्दी उतारकर खादी पहनते ही लोगों की संवेदनाएं कितनी दार्शनिक और कोमल हो जाती हैं!
किताब में क्या है: उम्मीद या आगामी राजनीति का एजेंडा?
अन्नामलाई जी की किताब में भारत की ‘फॉल्ट लाइन्स’ की बात की गई है। वैसे भारतीय राजनीति में इन दरारों का इस्तेमाल केवल वोट बटोरने और ध्रुवीकरण के लिए होता है, लेकिन साहब ने शायद इसे सुधारने का कोई अलौकिक सूत्र खोज निकाला है। जब एक तरफ उनकी पार्टी के बाकी दिग्गज ‘सब चंगा सी’ का ढोल पीटते हैं, तब अन्नामलाई जी का देश की दरारों पर रोना वास्तव में अद्भुत है। शायद यह ‘उम्मीद और निराशा’ का मिलन नहीं, बल्कि ‘तमिलनाडु में पांव जमाने की उम्मीद और दिल्ली के आकाओं की नजर में नंबर बनाने की कला’ का अनूठा मिलन है।
CJP और ज्ञान का भारी-भरकम भंडार
किताब में सीजेपी, छात्र असंतोष और न्याय प्रणाली के पहलुओं का ऐसा वर्णन है मानो साहब राजनीति छोड़कर सीधे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बनने की तैयारी कर रहे हों। तमिल राजनीति में ‘द्रविड़ियन मॉडल’ को पटकनी देने के लिए संघर्ष कर रहे अन्नामलाई जी अब पूरे भारत के नीति-शास्त्री बन गए हैं। तमिलनाडु की जनता सोच रही थी कि साहब जमीन पर कोई राजनीतिक चमत्कार करेंगे, लेकिन उन्होंने तो अंग्रेजी पन्नों वाली किताब छापकर विरोधियों को ‘ज्ञान से बोल्ड’ करने का फैसला कर लिया।
संक्षेप में कहें तो, यह किताब राजनीति के उस हुनर को दर्शाती है जहाँ हाथ में सत्ता की आकांक्षा और दिल में ‘साहित्यिक संवेदना’ एक साथ रह सकती है। काक-वाणी तो बस यही सलाह देगी कि देश के आंदोलनकारी छात्र इस किताब को जरूर पढ़ें, ताकि उन्हें पता चले कि जो आज पन्नों पर उनके प्रति ‘उम्मीद’ जता रहे हैं, कल सत्ता में आने पर वही उन्हें ‘कानून का पाठ’ कैसे पढ़ाएंगे!
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