अपमान की ‘होम डिलीवरी’ और भाजपा का सिलेक्टिव रोना

भारतीय राजनीति में अब ‘अपमान’ कोई साधारण शब्द नहीं रहा, यह एक पूर्णकालिक उद्योग बन चुका है। ‘द प्रिंट’ का यह कहना बिल्कुल सही है कि भाजपा का यह चयनात्मक आक्रोश (सिलेक्टिव आउटरेज) भारतीय राजनीति में एक नई संस्कृति को जन्म दे चुका है। हमारे काक-लोक में भी आजकल इसी बात की गहरी चर्चा है कि आखिर किस अपमान पर राष्ट्रव्यापी आंसू बहाने हैं और किसे ‘पॉलिटिकल ह्यूमर’ कहकर पचा जाना है। इसकी बाकायदा एक गाइडबुक होनी चाहिए।

भावनाओं का ‘कस्टम-मेड’ टेंडर

पुराने जमाने में लोग अपमानित होकर चुप रह जाते थे या कानूनी रास्ता अपनाते थे। लेकिन अब? अब अगर विपक्ष का कोई नेता संसद में जोर से हंस भी दे, तो वह ‘देश की संस्कृति का अपमान’ बन जाता है। भाजपा के पास भावनाओं का एक अनोखा ‘कस्टम-मेड’ टेंडर है। जब उनके अपने स्टार प्रचारक विपक्षियों को ‘दीदी-ओ-दीदी’ कहें या ‘जर्सी गाय’ पुकारें, तो वह केवल ‘क्रिएटिव पॉलिटिकल सैटायर’ यानी रचनात्मक हास्य होता है। लेकिन जैसे ही विपक्ष का कोई नेता प्रधानमंत्री की नीतियों की आलोचना कर दे, वैसे ही पूरी कैबिनेट की भावनाएं अचानक आईसीयू में वेंटिलेटर पर चली जाती हैं।

अपमान का राष्ट्रीयकरण

इस नई संस्कृति की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसमें अपमान का तुरंत ‘राष्ट्रीयकरण’ कर दिया जाता है। यानी, अगर किसी ने सत्ताधारी दल के किसी एक नेता की डिग्री या नीतियों पर सवाल उठाया, तो वह सीधे तौर पर पूरे देश, उसकी १३५ करोड़ जनता, उसकी प्राचीन संस्कृति और यहाँ तक कि अंतरिक्ष में घूम रहे उपग्रहों का भी अपमान मान लिया जाता है। क्या अद्भुत लॉजिक है! ‘मैं’ यानी ‘देश’, और ‘मेरा अपमान’ यानी ‘राष्ट्र का अपमान’।

दूसरी तरफ, विपक्ष के नेताओं को सुबह-शाम ‘पप्पू’, ‘शूर्पणखा’ या ‘आंदोलनजीवी’ कहना तो केवल राष्ट्रवाद का मीठा प्रसाद बांटने जैसा है। उस समय किसी की भावनाएं आहत नहीं होतीं, क्योंकि शायद विपक्षियों के पास भावनाएं रखने का सरकारी लाइसेंस ही नहीं है।

काक-वाणी का अंतिम ज्ञान

काक-वाणी का स्पष्ट मानना है कि आधुनिक राजनीति में त्वचा इतनी पतली (थिन-स्किन्ड) होनी चाहिए कि हवा का झोंका भी ‘अपमान’ का अहसास करा दे। भाजपा ने इस विधा में डॉक्टरेट हासिल कर ली है। अब देखना यह है कि क्या भविष्य में ‘अपमान’ मापने के लिए कोई नया ‘सेंटीमीटर’ पैमाना आएगा, या फिर यह ‘चयनात्मक रोना’ ही आने वाले चुनावों का मुख्य ईंधन बना रहेगा। खैर, जब तक भावनाएं कांच की तरह नाजुक हैं, तब तक राजनीति के पत्थरबाजों का धंधा मंदा नहीं होने वाला!


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कागा जी