अस्सी साल का ‘युवा’ लोकतंत्र और ‘रिन्यूअल’ की चमत्कारी फेयरनेस क्रीम

अस्सी की उम्र में ‘यूथ’ दिखने का नया फॉर्मूला

अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ ने बड़े ही गंभीर लहजे में चिंता जताई है कि अस्सी की उम्र की दहलीज पर खड़ा हमारा भारतीय लोकतंत्र अब ‘रिन्यूअल’ यानी नवीनीकरण की तलाश में है। अब भला इन बुद्धिजीवियों को कौन समझाए कि हमारे देश में लोकतंत्र कभी बूढ़ा नहीं होता! वह तो हर पांच साल में सिर्फ चुनावी रैलियों के लाउडस्पीकरों और नेताओं के वादों की चाशनी में डूबकर फिर से ‘रीबूट’ हो जाता है। लोकतंत्र का इससे बेहतर रिन्यूअल और क्या होगा कि अस्सी की उम्र में भी इसे हर सुबह टीवी चैनलों पर चीखते-चिल्लाते एंकरों के रूप में चिर-यौवन की संजीवनी बूटी मिल जाती है!

वाशिंग मशीन और रिजॉर्ट पॉलिटिक्स: रिन्यूअल के नए औजार

किताबी बुद्धिजीवियों के अनुसार नवीनीकरण के लिए आत्मनिरीक्षण और नैतिक मूल्यों की आवश्यकता होती है, लेकिन हमारी व्यावहारिक राजनीति में इसके लिए सिर्फ एक अच्छे पांच सितारा रिजॉर्ट और कुछ चार्टर्ड विमानों की जरूरत होती है। जब भी लोकतंत्र थोड़ा थका हुआ और सुस्त महसूस करता है, विधायकों का एक वफादार समूह अचानक किसी पहाड़ी राज्य के रिजॉर्ट में ‘योगासन’ करने चला जाता है। वहां से लौटते ही एक नई चमचमाती सरकार के रूप में लोकतंत्र का ‘फेसलिफ्ट’ हो जाता है। विपक्षी नेताओं के चेहरे पर जब भी भ्रष्टाचार की झुर्रियां दिखती हैं, वे सत्ताधारी दल की विशेष ‘वाशिंग मशीन’ में एक डुबकी लगाते हैं और एकदम निष्कलंक, युवा और राष्ट्रवादी बनकर बाहर आते हैं। इसे कहते हैं असली और टिकाऊ रिन्यूअल!

सत्तातंत्र की दूरदृष्टि और विपक्ष की अंतहीन खोज

लोकतंत्र के इस आधुनिक रिन्यूअल में सबसे बड़ा योगदान हमारी केंद्रीय जांच एजेंसियों का है, जो विपक्षी नेताओं को दिन-रात भाग-दौड़ करवाकर उनकी सेहत का विशेष ध्यान रखती हैं। विपक्ष अभी भी सड़कों पर लोकतंत्र की ‘आत्मा’ ढूंढ रहा है, जबकि सत्ता पक्ष ने लोकतंत्र का पूरा का पूरा सॉफ्टवेयर ही अपडेट कर दिया है। अब इस नए वर्जन में ‘सहमति’ की जगह ‘समर्पण’ का फीचर इनबिल्ट आता है और ‘संदेह’ करने वालों को सीधे मार्गदर्शक मंडल या जेल भेज दिया जाता है।

तो साथियों, ‘द हिंदू’ की चिंताओं को एक तरफ रखिए और आश्वस्त रहिए। हमारा लोकतंत्र अस्सी की उम्र में भी नहीं थकेगा। जब तक हमारे पास विपक्ष को थकाने के लिए सरकारी नोटिस हैं और जनता को रिझाने के लिए मुफ्त के चुनावी रेवड़ी-पैकेज हैं, तब तक लोकतंत्र का यह ‘रिन्यूअल’ बिना किसी रुकावट के चलता रहेगा। काक-वाणी की तरफ से इस अस्सी साल के ‘सदाबहार’ लोकतंत्र को डिजिटल बधाई!


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कागा जी