अरे भई, जरा पानी छिड़को! दक्षिणपंथी बुद्धिजीवियों के खेमे में अचानक हड़कंप मच गया है। दक्षिणपंथ के स्वघोषित मुखपत्र ‘स्वराज्य’ ने ऐसा कड़वा सच उगल दिया है कि ‘X’ (ट्विटर) पर रोज सुबह-शाम ट्रेंड कराने वाली उंगलियां अब डर के मारे कांपने लगी हैं। लेख कहता है कि दक्षिणपंथी इकोसिस्टम ने अब तक ऐसा कोई ‘पावर स्ट्रक्चर’ या स्थायी ढांचा नहीं बनाया है, जो इस सरकार के जाने के बाद भी खुद को बचा सके। वाह! पूरे दस साल की मलाईदार सत्ता भोगने के बाद यह दिव्यज्ञान प्राप्त हुआ है। काक-वाणी में आज इसी महान और देर से जागी चेतना की धज्जियां उड़ाई जाएंगी।
ट्विटर के महाबली और रीढ़विहीन संस्थाएं
पिछले एक दशक में हमारे वीर दक्षिणपंथी योद्धाओं ने क्या ऐतिहासिक सांस्कृतिक क्रांति की? उन्होंने वामपंथियों को ‘लिब्रैंडू’ कहा, हर विफलता के लिए नेहरू को कोसा और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से इतिहास की अनोखी डिग्रियां बांटीं। उन्हें लगा कि किसी फिल्म को बैन कराना या फूड डिलीवरी ऐप को बायकॉट करना ही असली बौद्धिक विमर्श है। जब वामपंथी और लिबरल दशकों से अकादमिक गलियारों, मीडिया और अदालतों में अपनी जड़ें गहरी कर रहे थे, तब हमारे दक्षिणपंथी बंधु टीवी चैनलों पर चिल्लाने वाले एंकरों को अपना ‘वैचारिक गुरु’ मानकर ताली बजा रहे थे। नतीजा? आज भी जब इन्हें कोई गंभीर बौद्धिक विमर्श करना होता है, तो इनके पास कोई एक ढंग की यूनिवर्सिटी या अंतरराष्ट्रीय स्तर का थिंक-टैंक नहीं है।
सरकारी ऑक्सीजन खत्म, तो खेल खत्म!
सच्चाई यह है कि इस इकोसिस्टम की जड़ें इतनी उथली हैं कि अगर कल को सत्ता बदल जाए, तो इनके बड़े-बड़े ‘योद्धा’ अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल पिक्चर बदलकर पुराने धर्मनिरपेक्ष चोले में वापस आ जाएंगे। संस्थानों के नाम पर इनके पास केवल कुछ गिने-चुने यूट्यूब चैनल और एनजीओ हैं, जो सरकारी विज्ञापनों और ग्रांट के बिना एक पन्ना भी नहीं छाप सकते। इन्होंने अपनी कोई स्वतंत्र साख नहीं बनाई। इनकी पूरी बौद्धिक क्षमता केवल इस बात पर निर्भर है कि सुबह सरकार का कौन सा आदेश आया है और उसे किस तरह ‘मास्टरस्ट्रोक’ घोषित करना है। जैसे ही सरकारी ऑक्सीजन का सिलेंडर हटेगा, यह पूरा वेंटिलेटर सिस्टम धड़ाम से गिर पड़ेगा।
काक-वाणी की मुफ्त सलाह
काक-वाणी का स्पष्ट मानना है कि जो साम्राज्य केवल सत्ता के टुकड़ों पर पलता है, उसका पतन निश्चित है। हे दक्षिणपंथी वीरों! केवल नेहरू को गाली देने से खुद का कद नेहरू जितना नहीं हो जाता। उसके लिए विचार, धैर्य और गहरे संस्थान गढ़ने पड़ते हैं। लेकिन आप तो रील बनाने और आईटी सेल के टूलकिट का इंतजार करने में व्यस्त रहे। अब जब ‘स्वराज्य’ आईना दिखा रहा है, तो रोने के बजाय कम से कम एक अच्छी किताब पढ़ ही लीजिए, बशर्ते वह व्हाट्सएप फॉरवर्ड न हो!
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