कुर्सी का ‘त्याग’ या अस्तित्व का स्वांग? नेशनल कॉन्फ्रेंस की अमर कहानी

कश्मीर की हसीन वादियों में जब भी ठंडी हवाएं चलती हैं, राजनीतिक गलियारों में ‘कुर्सी’ बचाने और ‘इस्तीफा’ देने की गर्माहट बढ़ जाती है। ‘इंडिया टुडे’ की ताजा रिपोर्ट का निचोड़ यही है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) सत्ता से इस्तीफे और अपने वजूद को बचाने की भारी जद्दोजहद में लगी है। अब जरा काक-वाणी के चश्मे से देखिए तो बात एकदम शीशे की तरह साफ है—कश्मीर में राजनीति का असली मतलब ही यही है कि ‘सत्ता के बिना चैन नहीं, और सत्ता में बने रहने के लिए कोई नाटक अधूरा नहीं’!

त्याग का महान नाटक या अगली कुर्सी की सेटिंग?

हमारे महान लोकतंत्र में ‘इस्तीफा’ देना एक ऐसा पवित्र राजनीतिक अनुष्ठान बन चुका है, जिसे केवल सत्ता में ज्यादा मजबूती से वापस आने के लिए किया जाता है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के माननीय नेताओं को जैसे ही लगता है कि जनता उन्हें भूलने लगी है या दिल्ली का रुख थोड़ा कड़ा हो गया है, वे तुरंत ‘बलिदान’ का कार्ड फेंक देते हैं। अरे साहब, इसे त्याग मत कहिए, यह तो शुद्ध रूप से ‘राजनीतिक फिक्स डिपॉजिट’ है! जब-जब पार्टी के सिपहसालार कुर्सी छोड़ने की बात करते हैं, तो पीछे की पूरी पटकथा सिर्फ इतनी होती है कि जनता भावुक हो जाए और कहे—’अरे हुजूर, आपके बिना हमारा क्या होगा?’

370 के बाद का मौसम और ‘सरवाइवल’ का सर्कस

अनुच्छेद 370 हटने के बाद से कश्मीर का मौसम और दिल्ली की बोली, दोनों बदल चुके हैं। अब नेशनल कॉन्फ्रेंस के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि वे बिना दिल्ली की तारीफ किए चुनाव कैसे लड़ें और बिना दिल्ली का हाथ थामे सत्ता के करीब कैसे पहुंचें? जब तक हाथ में पावर का रिमोट कंट्रोल न हो, तब तक हमारे नेताओं को लोकतंत्र खतरे में नजर आता है। और जैसे ही मलाईदार मंत्रालय मिल जाएं, वादियों में अचानक अमन, शांति और तरक्की की शहनाइयां बजने लगती हैं!

काक-वाणी का कड़वा निष्कर्ष

काक-वाणी का स्पष्ट और कड़वा मानना है कि कश्मीर में नेताओं का ‘इस्तीफा’ कभी पूर्णविराम नहीं होता, वह केवल एक छोटा सा ‘चाय ब्रेक’ होता है। नेशनल कॉन्फ्रेंस जितनी बार सत्ता से बाहर होती है, उतनी ही शिद्दत से वापस आने के लिए दरवाजे पर दस्तक देती है। जनता आज भी यही समझती है कि नेताजी उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि नेताजी सिर्फ अगली ‘शपथ ग्रहण’ की तारीख का इंतजार कर रहे हैं। कुर्सी का यह खेल आगे भी जारी रहेगा, और हम काक-वाणी से ऐसे ही कांव-कांव करते रहेंगे!


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कागा जी