वाह! मान गए वैश्विक पत्रकारिता के इस अनूठे चमत्कार को। जब भारत में विपक्ष के सारे राजनीतिक पैंतरे फेल हो गए, तो कतर के महान बुद्धिजीवियों (अल-जजीरा) ने भारतीय राजनीति को हिलाने के लिए एक बेहद ‘क्रांतिकारी’ जीव को ढूंढ निकाला है—’कॉकरोच’ यानी तिलचट्टा! जी हां, अब भारत के गटरों और रसोइयों से निकलने वाले ये छह पैरों वाले क्रांतिकारी मोदी सरकार के पसीने छुड़ाने वाले हैं। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में इस बात को लेकर भारी उत्साह है कि जो काम देश का विपक्ष दस साल में नहीं कर पाया, वो अब ये छोटे-छोटे जीव कर दिखाएंगे।
वैश्विक मीडिया की ‘माइक्रोस्कोपिक’ खोजी पत्रकारिता
हम तो अब तक नासमझ थे जो समझते थे कि भारतीय राजनीति में केवल ईवीएम, जातिगत समीकरण और मुफ्त की योजनाएं ही चुनाव तय करती हैं। लेकिन अल-जजीरा के खोजी पत्रकारों ने माइक्रोस्कोप लगाकर जो अभूतपूर्व खोज की है, उसने चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह के रणनीतिक दिमाग को भी हिला कर रख दिया होगा। उनका बेहद गंभीर सवाल है—क्या भारत का ‘कॉकरोच’ आंदोलन मोदी की भाजपा को अपनी राजनीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर करेगा?
सोचिए, दिल्ली के भाजपा मुख्यालय में इस वक्त कितनी भारी चिंता का माहौल होगा! प्रधानमंत्री कार्यालय में आपातकालीन बैठकें हो रही होंगी। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शायद देश में ‘रेड हिट’ (Red Hit) और ‘लक्ष्मण रेखा’ के राष्ट्रीय स्टॉक की समीक्षा कर रहे होंगे। आखिर मामला मामूली नहीं है, अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने तिलचट्टों को ‘विद्रोही’ घोषित जो कर दिया है!
विपक्ष की नई उम्मीद: ‘लाल बैग’ और ‘काला तिलचट्टा’
इस महान खुलासे के बाद, भारतीय विपक्ष को भी अपनी थकी हुई राजनीति में एक नई उम्मीद दिखाई दे रही है। जब जनता वोट नहीं दे रही, तो क्या हुआ? अब विपक्ष ‘कॉकरोच विमर्श’ को आगे बढ़ाएगा। मुमकिन है कि संसद के अगले सत्र में विपक्ष ‘तिलचट्टा बचाओ, लोकतंत्र बचाओ’ के नारे लगाए और रसोई में बेघर हुए कॉकरोचों के लिए मानवाधिकारों की तर्ज पर ‘कीटाधिकारों’ की मांग करे।
अल-जजीरा की इस दूरगामी रिपोर्टिंग से यह तो साफ है कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को अब भारत में मोदी को हराने के लिए इंसानों से उम्मीद पूरी तरह टूट चुकी है। तभी तो वे अब कीट-पतंगों में ‘लोकतंत्र का रक्षक’ ढूंढ रहे हैं। ‘काक-वाणी’ का तो यही परामर्श है कि अगली बार जब आप अपने घर में किसी कॉकरोच को देखें, तो उस पर चप्पल उठाने की भूल बिल्कुल न करें। क्या पता वह अल-जजीरा की नजर में लोकतंत्र बचाने की किसी बेहद गुप्त और पवित्र मुहिम पर निकला हो!
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