वाह! ड्रैगन के घर से एक और अमर ज्ञान की गंगा बही है। बीजिंग के सरकारी लाउडस्पीकर, यानी ‘ग्लोबल टाइम्स’ के परम ज्ञानी विशेषज्ञों ने खोज निकाला है कि भारत जो सीमा पर चीनी सेना की ‘सज्जन’ घुसपैठ की शिकायत करता है, वह कोई राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि भारतीय नेताओं का ‘घरेलू राजनीति का पैंतरा’ है। सचमुच, ‘काक-वाणी’ इस महान चीनी दूरदर्शिता के आगे नतमस्तक है!
चीनी चश्मे से भारतीय लोकतंत्र की झांकी
ग्लोबल टाइम्स के इन महान विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय सेना और सरकार के पास और कोई काम ही नहीं बचा है। जैसे ही देश में चुनाव या कोई राजनीतिक संकट नजदीक आता है, हमारे नेता सोचते हैं—”चलो, आज थोड़ा चीन-चीन खेल लेते हैं, कुछ वोट पक्के हो जाएंगे!” अब इन चीनी बेचारों को कौन समझाए कि हमारे देश में चुनाव जीतने के लिए मुफ़्त की रेवड़ियां, धर्म और जाति के समीकरण ही काफी हैं। चीन का नाम तो बस शाम को चाय की टपरी पर ‘राष्ट्रवाद’ का तड़का लगाने के लिए लिया जाता है।
पर ड्रैगन का गणित भी अद्भुत है। जब उनकी सेना लद्दाख या अरुणाचल की बर्फीली चोटियों पर ‘गलती से’ टेंट गाड़ देती है, तो वह तो उनकी ‘शांतिप्रिय पिकनिक’ होती है। लेकिन जब भारतीय गश्ती दल वहां पहुंचकर कहता है कि “अरे भाई, थोड़ा पीछे हटो!”, तो चीनी एक्सपर्ट्स रोना रोने लगते हैं—”देखिए, देखिए! यह तो भारतीय चुनाव जीतने का रणनीतिक पैंतरा है!”
लोकतंत्र का पाठ पढ़ाता तानाशाही का भोपू
सबसे मजेदार बात यह है कि जो देश खुद जिंदगी भर एक ही ‘आजीवन राष्ट्रपति’ के भरोसे बैठा है, जहाँ ‘चुनाव’ शब्द का मतलब सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक में ताली बजाना होता है, वह हमें ‘घरेलू राजनीति’ का पाठ पढ़ा रहा है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार अगर सीमा पर गश्त और संप्रभुता का मुद्दा उठाती है, तो चीनी विशेषज्ञों को इसमें सिर्फ भारतीय मतदाताओं को लुभाने का स्टंट नजर आता है।
खैर, ‘काक-वाणी’ का चीनी विशेषज्ञों को एक मुफ़्त का सुझाव है: अगली बार जब आपकी सेना भारतीय सीमा में कदम रखे, तो उसे ‘भारतीय चुनावी रैलियों का निमंत्रण’ मत समझिएगा, वह सिर्फ हमारी ज़मीन है। बाकी रही बात भारतीय राजनीति के सर्कस की, तो उसके लिए आपको बॉर्डर पार करने की जरूरत नहीं है, घर बैठे भारतीय न्यूज़ चैनल ही देख लिया कीजिए!
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