चुनाव चिह्न की जंग: जब ‘घास-फूस’ ही बन जाए जीवन का आधार!

भारतीय राजनीति के रंगमंच पर आपका स्वागत है, जहां ‘काम’ से ज्यादा ‘चमचमाते निशान’ की कीमत होती है। ताजा मामला हमारी प्रिय दीदी की पार्टी, यानी तृणमूल कांग्रेस का है। ‘डेक्कन हेराल्ड’ की खबर ने लोकतंत्र के उस सबसे बड़े सच को उजागर किया है, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं—”आखिर एक चुनाव चिह्न में क्या रखा है?” अरे हुजूर, बहुत कुछ रखा है! पूरी सरकार, मंत्रियों की गाड़ियां और नेताओं का अहंकार इसी एक ड्राइंग पर तो टिका है!

पहचान का संकट या वनस्पति विज्ञान का लोकतंत्र?

तृणमूल कांग्रेस का चिह्न है—’जोड़ा फूल’ यानी घास के ऊपर खिले दो फूल। भारतीय राजनीति में यह अकेला ऐसा वनस्पति चमत्कार है, जो बिना पानी और खाद के, सिर्फ राजनीतिक रैलियों की गर्मी और भाषणों के पानी से फलता-फूलता है। अब इस पर संकट के बादल क्या मंडराए, मानो बंगाल की खाड़ी में कोई नया चक्रवात आ गया हो। हमारे देश में नेता अपनी विचारधारा बदल सकते हैं, कल के घोर विरोधी को गले लगा सकते हैं, सुबह किसी और पार्टी में और शाम को किसी और में जा सकते हैं, लेकिन अपना ‘निशान’ नहीं खो सकते। क्योंकि जनता को समझाने के लिए खोपड़ी की जरूरत होती है, पर अंगूठा दबाने के लिए तो सिर्फ ‘निशान’ ही काफी है!

निशान मिटा तो वजूद मिटा!

सोचिए, अगर किसी दिन चुनाव आयोग ने तृणमूल से उनका ‘जोड़ा फूल’ छीन लिया, तो क्या होगा? क्या दीदी की ममता कम हो जाएगी? या फिर बंगाल के कुलीनों को घास की जगह मखमल पर चलना पड़ेगा? भारतीय राजनीति की खूबसूरती यही है कि यहां ‘सिंबल’ ही सब कुछ है। हाथ का पंजा, कमल का फूल, झाड़ू या फिर साइकिल—ये सिर्फ चुनाव चिह्न नहीं हैं, बल्कि ये नेताओं के वे सुरक्षा कवच हैं जिसके पीछे वे अपनी पांच साल की नाकारामियां छुपाते हैं। अगर काम के दम पर वोट मांगना पड़े, तो शायद आधे से ज्यादा नेताओं की जमानत जब्त हो जाए। इसलिए, ‘चिह्न’ बचाना जरूरी है, देश चाहे जहां जाए!

‘काक-वाणी’ का स्पष्ट मानना है कि यदि किसी दिन देश के सभी राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्न छीन लिए जाएं और उन्हें सिर्फ उनके ‘काम’ के आधार पर वोट मांगने को कहा जाए, तो पूरे देश के सियासी गलियारों में सन्नाटा पसर जाएगा। लोकतंत्र का यह नया ‘प्रतीक-वाद’ यह साबित करता है कि राजनीति में ‘लोग’ अस्थायी हैं, ‘वाद’ नकली हैं, पर ‘निशान’ अमर हैं। तो चलिए, अगली बार जब आप वोट देने जाएं, तो उम्मीदवार का चेहरा मत देखिए, बस यह देखिए कि वह कौन सा फूल या पत्ती बेच रहा है!


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कागा जी