राम-राम भाइयों और बहनों! ‘काक-वाणी’ में आपका स्वागत है। हम तो सोचते थे कि लोकतंत्र में सरकारों को हिलाने के लिए भारी-भरकम जन आंदोलनों, अनशनों और करोड़ों के चुनावी खर्च की जरूरत होती है। लेकिन बीबीसी की एक ताजा रिपोर्ट ने हमारी इस भोली-भाली गलतफहमी को दूर कर दिया है। पता चला है कि देश में तख्तापलट के लिए अब ‘कॉकरोच’ (तिलचट्टे) ही काफी हैं। जी हां, छात्र कार्यकर्ता अभिजीत दिपके ने यह साबित कर दिया कि जो काम तमाम विपक्षी दल सालों-साल छाती पीटकर नहीं कर पाए, वो कुछ नन्हे-मुन्ने कॉकरोचों ने कुछ ही दिनों में कर दिखाया और एक रसूखदार मंत्री जी को अपनी गद्दी छोड़नी पड़ी।
कॉकरोच क्रांति: जब तिलचट्टे बने लोकतंत्र के नए रक्षक
सोचिए, जिस देश के नेता बड़े-बड़े घोटालों, अदालती मुकदमों और जनता के तीखे सवालों को हंसते-हंसते डकार जाते हैं, वे आखिर किससे डरते हैं? ईडी (ED) से? सीबीआई (CBI) से? या चुनाव में हारने से? जी नहीं, वे डरते हैं लाल-भूरे रंग के रेंगने वाले नन्हे जीवों से! अभिजीत दिपके नामक इस तेजस्वी छात्र ने मंत्री जी के विभाग की लापरवाही और सड़ांध को उजागर करने के लिए ऐसा नायाब तरीका निकाला कि खुद यमराज भी अपनी भैंस रोककर तालियां बजाने लगे होंगे।
जब आम जनता पानी की किल्लत, खराब सड़कों या अस्पतालों की बदहाली के खिलाफ चिल्लाती है, तो मंत्री जी अपने कानों में ‘सत्ता सुख’ की रूई ठूंस लेते हैं। लेकिन जब उसी बदहाली के प्रतीक बनकर ‘कॉकरोच’ सीधे मंत्री जी के दफ्तर और घर पर दस्तक देने लगे, तो साहेब का वीआईपी खून सूख गया। आखिर सिस्टम की नाकामी जब सीधे उनके चाय के कप के पास रेंगने लगे, तो इस्तीफा देना ही सबसे सुरक्षित विकल्प बचता है।
विपक्ष के लिए मुफ्त की सलाह: ‘हिट’ (HIT) स्प्रे से बचकर रहिए!
इस ऐतिहासिक घटना से देश के थके-हारे और सुस्त पड़े विपक्ष को बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। अब बड़ी-बड़ी रैलियों और महंगे घोषणापत्रों पर पैसा बर्बाद करने की कोई जरूरत नहीं है। बस पास की नाली या किसी पुराने सरकारी दफ्तर की फाइलों से कुछ ‘स्वयंसेवकों’ (कॉकरोचों) को इकट्ठा कीजिए और उन्हें लिफाफे में बंद करके मंत्रियों के पते पर स्पीड पोस्ट कर दीजिए। इस्तीफा अपने आप कूरियर से वापस आ जाएगा।
बेचारे मंत्री जी भी क्या करते! जनता के सवालों का सामना तो वे अपनी मोटी चमड़ी के भरोसे कर सकते थे, लेकिन इन बिन-बुलाए रेंगने वाले मेहमानों का मुकाबला कैसे करते? आखिरकार, उन्होंने ‘नैतिकता’ का हवाला देकर (जिसका वजूद केवल इस्तीफे के कागज पर ही होता है) अपनी कुर्सी छोड़ दी।
काक-वाणी की तरफ से अभिजीत दिपके को इस ‘पेस्ट-कंट्रोल’ राजनीति के लिए बधाई। बाकी बचे हुए मंत्रियों को हमारी यही सलाह है कि अगली बार जब वे किसी फाइल पर दस्तखत करें, तो बगल में ‘लक्ष्मण रेखा’ जरूर खींच लें, क्योंकि छात्र अब जाग चुके हैं और उनके पास कॉकरोचों की पूरी सेना तैयार है!
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