हाल ही में ‘स्क्रॉल’ ने एक बड़ा ही बचकाना सवाल उठा दिया—”आखिर लोग भारत के जीडीपी (GDP) आंकड़ों पर भरोसा क्यों नहीं कर रहे?” अब भला इस सीधे-सादे सवाल के पीछे छिपे गहरे ‘राष्ट्रवाद’ को ये विदेशी चश्मे वाले पत्रकार क्या समझें! हमारी मोदी सरकार ने देश को वह दिव्य अर्थशास्त्र दिया है, जिसे समझने के लिए दिमाग की नहीं, बल्कि असीम श्रद्धा की आवश्यकता होती है। यदि आपकी जेब खाली है और आप फिर भी आठ प्रतिशत की विकास दर देखकर खुशी से नहीं नाच रहे, तो दोष आंकड़ों का नहीं, बल्कि आपकी राष्ट्रभक्ति का है।
गणित का दिव्य परिवर्तन और फॉर्मूले का चमत्कार
पुराने जमाने के अर्थशास्त्री बड़े दकियानूस हुआ करते थे। वे रोजगार, महंगाई और वास्तविक उपभोग के आधार पर जीडीपी मापते थे। कितनी पिछड़ी सोच थी! हमारी सरकार ने इस व्यवस्था को ‘डिजिटल’ और आधुनिक बनाया है। जब भी आंकड़े मनमाफिक न आएं, बस फॉर्मूला बदल दीजिए या बेस ईयर (आधार वर्ष) को सरका दीजिए। यह ठीक वैसा ही है जैसे परीक्षा में कम नंबर आने पर सीधे रिपोर्ट कार्ड का पासिंग मार्क्स ही बदल दिया जाए। अब इस क्रांतिकारी ‘गणितीय योग’ पर भी अगर कोई शक करे, तो उसे तुरंत देशद्रोही घोषित कर देना चाहिए।
जेब में कंगाली, पर कागजों पर छप्परफाड़ खुशहाली
कुछ सिरफिरे लोग चिल्ला रहे हैं कि बाजार में मांग गायब है, लोग बिस्कुट के पैकेट भी सोच-समझकर खरीद रहे हैं, और बेरोजगारी चरम पर है। लेकिन वे यह नहीं समझते कि यह ‘अध्यात्मिक अर्थशास्त्र’ है। जब आपके पास पैसे नहीं होते, तो आप कम खर्च करते हैं, जिससे पर्यावरण बचता है। यह भी तो एक प्रकार का विकास ही है! हमारी विकास दर इतनी दिव्य है कि वह जमीन पर रेंगने वाले आम इंसानों को दिखाई ही नहीं देती; वह सीधे हवा में उड़ती हुई फाइव-स्टार होटलों के सम्मेलनों में लैंड करती है।
सच्चा नागरिक वही जो अपनी जेब पर नहीं, सरकारी दावों पर भरोसा करे
अंत में, ‘काक-वाणी’ का यही संदेश है कि देश के नागरिकों को अपनी खाली जेब और भूखे पेट पर भरोसा करने के बजाय सरकारी डेटा पर भरोसा करना चाहिए। अगर सरकार कह रही है कि हम विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाले हैं, तो मान लीजिए कि आपका पेट भरा हुआ है। अगर आपके पास नौकरी नहीं है, तो उसे ‘स्टार्टअप’ या ‘आत्मनिर्भरता’ का पहला चरण मानकर संतोष कीजिए। आखिरकार, कागजी पुलाव का स्वाद ही कुछ और होता है, कम से कम इसमें महंगाई का तड़का तो नहीं लगता!
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