वाह! क्या आंकड़े हैं। जब पूरा देश महंगाई, बेरोजगारी और खाली जेबों का रोना रो रहा है, तब हमारी जीडीपी ऐसे दौड़ रही है जैसे उसे कोई ओलंपिक मेडल जीतना हो। हाल ही में ‘स्क्रॉल’ ने एक गंभीर सवाल उठाया कि आखिर लोग भारत के जीडीपी डेटा पर भरोसा क्यों नहीं कर रहे हैं? अब भला बताइए, इस देश में लोगों को सच पचाने की आदत ही नहीं रही। हमारी नरेंद्र मोदी सरकार दिन-रात एक करके कंप्यूटर पर बैठकर जो जादुई आंकड़े तैयार करती है, उस पर भी लोग शक कर रहे हैं। यह तो सरासर राष्ट्रद्रोह है!
नया गणित, नया भारत: जहां आंकड़े गाते हैं देशप्रेम के गीत
पुराने जमाने के अर्थशास्त्री भी बड़े अजीब थे। वे कहते थे कि अगर लोगों की आमदनी बढ़ेगी, तभी देश तरक्की करेगा। लेकिन नए भारत में अर्थशास्त्र की परिभाषा ही बदल चुकी है। अब नरेंद्र मोदी सरकार के नेतृत्व में हमारे पास ‘डायनेमिक डेटा’ की शक्ति है। आपके पास रोजगार हो या न हो, आपकी थाली से दाल गायब हो चुकी हो, लेकिन अगर सरकारी कंप्यूटर कह रहा है कि देश 8% की दर से भाग रहा है, तो आपको भी अपनी थकी हुई टांगों के साथ भागना ही पड़ेगा। अगर आप इस पर सवाल उठाते हैं, तो आप सीधे तौर पर देश की छवि खराब करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा हैं। आखिर कागजी आंकड़ों की चमक के आगे आपकी खाली जेब की क्या बिसात?
थाली खाली, लेकिन डेटा भारी: डेटा खाइए, स्वस्थ रहिए
अविश्वास की मुख्य वजह यह बताई जा रही है कि जमीन पर लोगों की खरीदने की क्षमता घट रही है, पर जीडीपी बढ़ रही है। अरे भाई, यह तो सरकार की ‘डाइट कंट्रोल’ योजना है! अगर आप कम खाएंगे, तो देश का अनाज बचेगा और वह निर्यात होकर देश की जीडीपी बढ़ाएगा। यह इतना सरल विज्ञान है जो इन विदेशी चश्मा पहनने वाले बुद्धिजीवियों को समझ नहीं आता। काक-वाणी का सीधा सुझाव है: सुबह उठकर चाय-पराठे की जगह जीडीपी की पीडीएफ फाइल डाउनलोड करके पढ़ा करें। इससे आपका पेट भी भरेगा और राष्ट्रभक्ति की भावना भी जागृत होगी। जब तक सरकारी दफ्तरों में एक्सेल शीट जिंदा है, भारत को विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता, भले ही हकीकत में आम आदमी राशन की कतार में खड़ा हांफ रहा हो!
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