बहुत पुरानी बात है, नर्मदा नदी के पावन तट पर बसे एक समृद्ध नगर में धर्मदास नाम का एक अत्यंत धनी व्यापारी रहता था। उसके पास धन, दौलत, महल और मान-सम्मान की कोई कमी नहीं थी। लेकिन जैसे-जैसे उसकी उम्र ढलने लगी, उसके मन में एक अजीब सा डर घर करने लगा। उसे हर समय यही चिंता सताती कि उसकी मृत्यु के बाद इस अपार संपत्ति का क्या होगा? वह जीवन के अंतिम सच को जानने के लिए अंदर ही अंदर व्याकुल रहने लगा।
एक महात्मा से अनोखी भेंट
एक उदास शाम, सेठ धर्मदास नदी के किनारे टहल रहा था। तभी उसकी दृष्टि एक वृद्ध संन्यासी पर पड़ी जो बहती धारा में सूखी पत्तियों को बहते हुए बड़े ध्यान से देख रहे थे। सेठ उनके पास गया और अश्रुपूरित नेत्रों से हाथ जोड़कर बोला, “हे महात्मा! मुझे जीवन का सबसे बड़ा सच बताइए। मैं हर पल मृत्यु के भय और धन के मोह में जल रहा हूँ। क्या साथ जाएगा और क्या यहीं छूट जाएगा?”
महात्मा ने मुस्कुराकर अपनी झोली से मिट्टी का एक छोटा सा घड़ा निकाला। उस घड़े के तले में एक छोटा सा छेद था। उन्होंने घड़े में नदी किनारे की थोड़ी सी सूखी रेत भरी और सेठ के हाथों में थमा दी। महात्मा बोले, “इस घड़े को अपने घर ले जाओ। रास्ते में ध्यान रखना कि घड़े की रेत धीरे-धीरे नीचे गिर रही है। जब तुम अपने महल पहुँचोगे, तब तुम्हें तुम्हारे सवाल का उत्तर मिल जाएगा।”
खाली घड़ा और बहते आँसू
सेठ उस घड़े को बहुत संभालकर ले जाने लगा। वह हर कदम पर डर रहा था कि रेत खत्म न हो जाए। वह गिरती हुई रेत को अपनी हथेलियों से रोकने का प्रयास करता, लेकिन बारीक रेत उसकी उंगलियों के बीच से लगातार सरकती रही। जब सेठ अपने महल के मुख्य द्वार पर पहुँचा, तो उसने देखा कि घड़ा पूरी तरह खाली हो चुका था। उसकी हथेलियों पर केवल मिट्टी का दाग था और हाथ खाली थे। यह देखकर सेठ की आँखों से आँसू छलक पड़े।
सेठ तुरंत भागता हुआ वापस नदी किनारे पहुँचा और महात्मा के चरणों में गिर पड़ा। उसने रोते हुए कहा, “महाराज! घड़े की सारी रेत रास्ते में ही गिर गई। मैं चाहकर भी उसे रोक नहीं पाया। अंत में मेरे हाथ खाली ही रह गए।”
जीवन की सच्ची सीख
महात्मा ने सेठ को उठाकर प्रेम से गले लगाया और शांत स्वर में कहा, “हे सेठ! यही जीवन का परम सच है। यह माटी का घड़ा तुम्हारा शरीर है और इसमें भरी रेत तुम्हारी साँसें और समय है। तुम चाहे धन का कितना भी घमंड कर लो या उसे सहेजने की कोशिश करो, समय की यह रेत हर पल गिर रही है। जब जीवन का अंतिम क्षण आएगा, तो तुम्हारे हाथ ऐसे ही खाली रह जाएँगे।”
महात्मा ने आगे कहा, “जो रेत रास्ते में गिरी, उसने धरती को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया, बल्कि राह के पौधों को सँवारा। ठीक उसी तरह, जीवन की सार्थकता धन बटोरने में नहीं, बल्कि अपने समय को दूसरों के दुख बाँटने, प्रेम और करुणा फैलाने में है।” सेठ धर्मदास की आँखें खुल गईं। उसका सारा भय समाप्त हो गया और उसने अपना पूरा जीवन समाज कल्याण में समर्पित कर दिया।
कथा की सीख
सीख: इस लोककथा से हमें यह सीख मिलती है कि संसार का धन-दौलत और भौतिक वस्तुएँ सब यहीं छूट जाती हैं। मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है। केवल हमारे द्वारा बाँटा गया प्रेम, करुणा और हमारे सत्कर्म ही इस संसार में अमर रहते हैं। इसलिए संग्रह करने के बजाय समर्पण से जीना सीखें।