“झूठ का साया”
एक छोटी सी गांव में रहने वाले प्रताप सिंह के दो बच्चे एक साथ उग्रते थे। उनका पुत्र वीर और पुत्री सीता। प्रताप सिंह के पास कम समय होता था इस लिए वह उन्हें उतार- चढ़ाव का काम देते थे। वीर सफलतापूर्वक इसके लिए तैयार रहता था लेकिन सीता हमेशा इससे परेशान रहती थी। उससे नहीं होता था और वह बार- बार अपने पिताजी से कुछ न कुछ कहने की कोशिश करती रहती थी।
एक दिन सीता ने अपने पिता के सामने सच कह दिया। वह बताई कि वीर कभी उतार-चढ़ाव का काम नहीं करता और पैसे गंवा देता है। प्रताप सिंह अचानक ही क्रोधित हो गया। उन्होंने वीर को व्यवसाय से बाहर कर दिया और सीता से कहा कि वह हमेशा सच बोलना सीखे।
वीर अपनी बहन के बारे में बड़े छोटे लोगों से सलाह लेने लगा कि कैसे वह इस स्थिति से बुरा साढ़ रही है। उनमें से एक व्यापारी ने वीर को एक नौकरी के लिए रखा और उसे जिम्मेदारी दी कि वह अपने काम को सच्चाई और निष्ठा से करें।
सीता अपने पिता के साथ एक दिन शहर जा रही थी जब उन्होंने अपनी बड़ी बहन को सड़क किनारे खड़ा देखा जो एक दुकान में काम कर रही थी। सीता ने अपनी बड़ी बहन से माफी मांगी और उसे घर लाकर उसे देखभाल की।
जब प्रताप सिंह पता लगा कि उसकी बड़ी बेटी उसके आश्रम से भाग गयी है, तो उनका जी उठा था। उन्होंने अपनी सेक्रेटरी को उसे खोजने को कहा। कुछ दिनों के बाद, कंपनी की सेक्रेटरी ने उससे संपर्क किया और उसे आश्रम पर बुलाया।
जब प्रताप सिंह उनकी बैठक में पहुंचा, तो वीर ने उससे सच सिद्ध कर दिया कि वह अपने काम बढ़िया तरीके से कर रहा है। पैसे भी सोच समझ कर खर्च करता है।
प्रताप सिंह महसूस करते हुए उससे माफी मांगते हुए कहा, “मैं अपने जाल में फंस गया था। मुझे लगा कि मेरे बच्चे झूठ बोल रहे हैं, लेकिन सच तो खुद से बड़ा होता है।”
इस घटना से यही बात सबक मिलती है कि हमेशा सच्चाई बोलनी चाहिए। झूठ लोगों के बीच अक्सर मुश्किलें पैदा करता है और समझना बहुत मुश्किल होता है कि इस पर कैसे प्रतिक्रिया करें। इसलिए एक समय में ही सच बोलने से हमें बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।