‘टर्निंग पॉइंट’ के चक्रव्यूह में फंसी कांग्रेस: जब यात्रा तो बढ़ी, पर सीटें वहीं खड़ी रहीं!

वाह रे राजनीति! और सौ बार वाह रे हमारी प्यारी कांग्रेस! जब पूरा देश महंगाई, बेरोजगारी और आगामी चुनावों के फेर में उलझा हुआ है, तब कांग्रेस मुख्यालय में शहनाइयां बज रही हैं। मौका बेहद ऐतिहासिक है—’भारत जोड़ो यात्रा’ के सफल चार साल पूरे हो चुके हैं। कांग्रेस के आलाकमान इसे भारतीय राजनीति का ‘टर्निंग पॉइंट’ घोषित कर चुके हैं। अब ‘काक-वाणी’ का काम ही है इस टर्निंग पॉइंट की गहराई में चोंच मारना, तो चलिए ज़रा इस मोड़ का भूगोल और इतिहास समझते हैं।

‘टर्निंग पॉइंट’ का अनोखा राजनीतिक गणित

गणित के नियमों के अनुसार, जब आप किसी पॉइंट से पूरा घूमकर ‘टर्न’ लेते हैं, तो आप ठीक उसी जगह वापस पहुंच जाते हैं जहां से आपने शुरुआत की थी। कांग्रेस के ‘टर्निंग पॉइंट’ के साथ भी कुछ ऐसा ही चमत्कार हुआ है। चार साल तक हज़ारों किलोमीटर चलने, सफेद टी-शर्ट के फैशन को अमर बनाने और दाढ़ी के नए कीर्तिमान स्थापित करने के बाद भी, पार्टी चुनावी सफलता के मामले में लगभग उसी चौराहे पर खड़ी दिखाई देती है। यात्रा से पहले भी वे ईवीएम को कोसते थे, और यात्रा के चार साल बाद भी उनका यह विलाप जारी है। इसे कहते हैं संकल्प की दृढ़ता!

देश तो जुड़ गया, पर पार्टी का क्या?

राहुल गांधी ने कन्याकुमारी से कश्मीर तक पैर घिस दिए, यह साबित करने के लिए कि देश को नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान की ज़रूरत है। दुकान तो खुल गई, लेकिन विडंबना देखिए कि उस दुकान के खुलते ही खुद कांग्रेस के कई बड़े ‘सेल्समैन’ अपना सामान समेटकर दूसरी प्रतिद्वंद्वी दुकान में शिफ्ट हो गए। ‘भारत जोड़ो’ के शोर के बीच ‘कांग्रेस छोड़ो’ अभियान भी समानांतर चलता रहा। देश तो जुड़ गया, पर पार्टी के अपने ही ‘अंग’ आपस में ऐसे बिखरे कि आज तक गोंद की तलाश जारी है। लेकिन हां, कांग्रेस के सोशल मीडिया मैनेजरों के लिए यह वाकई बड़ा ‘टर्निंग पॉइंट’ था, जिन्हें रैलियों के लिए कुछ शानदार रील्स और बैकग्राउंड म्यूजिक मिल गए।

काक-वाणी का अंतिम ज्ञान

अंत में, ‘काक-वाणी’ सिर्फ इतना ही कहेगी कि राजनीति में सिर्फ ‘चलने’ से ज़्यादा ज़रूरी है सही दिशा में ‘आगे बढ़ना’। अगर चार साल की लंबी पदयात्रा के बाद भी जनता आपको संसद की सीढ़ियों के बजाय उसी पुराने ‘वेटिंग रूम’ में खड़ा देख रही है, तो शायद चश्मे का नंबर बदलने की ज़रूरत खुद कांग्रेस को है। खैर, शुभकामनाएं! चलते रहिए, क्योंकि वैसे भी बिना सत्ता के विपक्ष के पास सुबह की सैर करने के अलावा और काम ही क्या बचा है!


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कागा जी