नमस्कार दर्शकों! ‘काक-वाणी’ में आपका स्वागत है। आज हम बात करेंगे उस विषय पर जिसे ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका ने बेहद संजीदगी से “आक्रोश और उम्मीद की राजनीति” कहा है। जी हां, हम बात कर रहे हैं भारत के छात्र आंदोलनों की। लेकिन हमारे चश्मे से देखने पर पता चलता है कि यहाँ ‘आक्रोश’ तो सिर्फ मासूम छात्रों के हिस्से आता है, जबकि ‘उम्मीद’ सीधे राजनीतिक दलों के मुख्यालयों में जाकर दीप जलाती है।
क्रांति का नया सिलेबस: चाय, समोसा और कैमरा!
भारतीय विश्वविद्यालयों में आजकल पढ़ाई से ज्यादा ‘क्रांति’ का सिलेबस लोकप्रिय हो रहा है। विश्वविद्यालय अब ज्ञान के मंदिर कम, और राजनीतिक दल के लिए नए रंगरूट तैयार करने वाले ट्रेनिंग सेंटर ज्यादा नजर आते हैं। जब भी कोई छात्र आंदोलन होता है, तो मुख्य मुद्दा यानी ‘पेपर लीक’, ‘फीस वृद्धि’ या ‘बेरोजगारी’ तो बैकग्राउंड म्यूजिक बन जाता है। मुख्य धारा में आ जाते हैं वे भावी नेताजी, जो कैमरे के सामने अपने कुर्ते की आस्तीन चढ़ाते हुए ‘इंकलाब’ का नारा लगाते हैं।
ये छात्र आंदोलन किसी भी उभरते हुए नेता के लिए सबसे बेहतरीन ‘लांच पैड’ हैं। डिग्री भले ही तीन साल में न मिले, लेकिन तीन हफ्तों के धरने के बाद किसी बड़े दल की युवा इकाई का टिकट मिलने की गारंटी जरूर मिल जाती है। आंदोलन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहाँ फेल होने का कोई डर नहीं होता, बस आपके फेफड़ों में हवा और नारे लगाने की क्षमता होनी चाहिए।
छात्रों का आक्रोश, नेताओं की ‘उम्मीद’
अब बात करते हैं उस ‘उम्मीद’ की, जिसका जिक्र बुद्धिजीवियों ने किया है। इस पूरे खेल में छात्रों की उम्मीद यह होती है कि शायद उनकी परीक्षाएं समय पर होंगी और उन्हें नौकरी मिलेगी। लेकिन किसी भी बड़े राजनीतिक दल की उम्मीद कुछ और ही होती है। वे उम्मीद करते हैं कि पुलिस की एक लाठी छात्र की पीठ पर पड़े, ताकि वे अगले दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ‘लोकतंत्र की हत्या’ का विलाप कर सकें और अपना वोट बैंक मजबूत कर सकें।
ट्विटर पर ‘हैशटैग जस्टिस’ चलाने वाले हमारे माननीय नेतागण तब तक उस आंदोलन स्थल पर कदम नहीं रखते, जब तक कि वहां टीवी कैमरों की ओबी वैन न पहुंच जाए। आखिरकार, बिना पब्लिसिटी के कैसा आक्रोश और कैसी उम्मीद? छात्र बेचारा धूप में काला पड़ता रहता है, और नेताजी की गाड़ी के एसी की ठंडी हवा में उनका राजनीतिक भविष्य सुनहरा होता जाता है।
निष्कर्ष: डिग्री अधूरी, राजनीति पूरी!
अंत में, ‘काक-वाणी’ का निष्कर्ष यही है कि भारत में छात्र आंदोलन एक ऐसी अनोखी फैक्ट्री है, जहाँ कच्चा माल छात्र होते हैं, भट्टी आक्रोश की होती है, और तैयार उत्पाद के रूप में एक चमचमाता हुआ नया ‘पार्टी प्रवक्ता’ बाहर निकलता है। बाकी बचे हुए आम छात्र? खैर, वे अगले साल की परीक्षा के टलने और अगले नए आंदोलन की तैयारी में जुट जाते हैं। राजनीति अमर रहे, छात्र तो हर साल नए आ ही जाते हैं!
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