तेल का खेल: जब पश्चिमी ‘ज्ञान’ पर भारी पड़ा भारत का ‘बचत’ ज्ञान!

अरे भाई, जरा दिल थाम कर बैठिए! दुनिया के महानतम कूटनीतिज्ञों और पश्चिमी चश्मे से दुनिया देखने वाले पत्रकारों को आखिरकार एक ऐसा दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ है, जिसने उनके पैरों तले की ज़मीन ही खिसका दी है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार के चौधरी ‘oilprice.com’ ने एक बेहद क्रांतिकारी ‘खुलासा’ किया है। उनका कहना है कि भारत तेल खरीदते समय ‘वैश्विक राजनीति’ नहीं, बल्कि ‘कीमत’ देखता है। वाह भाई वाह! इस अद्भुत, अलौकिक और अभूतपूर्व खोज के लिए इस वेबसाइट के पत्रकारों को तो सीधे नोबेल पुरस्कार दे देना चाहिए!

पश्चिमी नैतिकता बनाम भारतीय बटुआ

अब तक हमारे अमेरिकी और यूरोपीय चाचा-ताऊ हमें समझा रहे थे कि तेल की हर बूंद में ‘लोकतंत्र’ और ‘मानवाधिकार’ का स्वाद होना चाहिए। उनके हिसाब से हमें रूस से तेल इसलिए नहीं खरीदना चाहिए क्योंकि इससे उनकी भू-राजनीतिक ईगो को ठेस पहुंचती है। लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार ने बहुत प्यार से उनके कानों में फुसफुसा दिया—’बाप बड़ा ना भैया, सबसे बड़ा रुपैया’। जब पूरी दुनिया में महंगाई की आग लगी हो, तब नैतिकता का चूर्ण खाकर देश की जनता का पेट तो भरा नहीं जा सकता।

जयशंकर जी का ‘डिस्काउंटेड’ राष्ट्रवाद

पश्चिमी मीडिया हैरान-परेशान है कि भारत उनकी ‘लाल आंखों’ को देखकर डरा क्यों नहीं? असल में उन्हें हमारे देश के बुनियादी चरित्र का अंदाज़ा ही नहीं है। जिस देश में दो रुपये की बचत के लिए लोग सब्जी वाले से मुफ्त की धनिया-मिर्ची छीन लेते हैं, वहां अरबों डॉलर का डिस्काउंट देने वाले रूस को कैसे छोड़ दिया जाता? विदेश मंत्रालय ने भी पश्चिमी देशों को आईना दिखाते हुए साफ कह दिया कि हमारी पहली ज़िम्मेदारी हमारे अपने देश के गरीब उपभोक्ताओं के प्रति है। कूटनीति की इस ‘बनिया बुद्धि’ को देखकर आज पूरा पश्चिम सिर खुजला रहा है।

नैतिकता की बातें और तेल की धार

काक-वाणी का तो स्पष्ट मानना है कि तेल के इस खेल में भारत ने साबित कर दिया है कि असली ‘विश्वगुरु’ वही है जो कम दाम में काम चला ले। पश्चिम चाहे जितनी भी पाबंदियों की घुड़की दे, जब बात जेब पर आती है तो भारत का राष्ट्रवाद ‘डिस्काउंट’ को गले लगा ही लेता है। आखिर में सबक यही है—दुनिया चाहे कितनी भी बड़ी-बड़ी बातें करे, शाम को चूल्हा जलाने के लिए सस्ता तेल ही काम आता है, पश्चिम का खोखला भाषण नहीं!


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कागा जी