तेल की ‘सेल’ और कूटनीति का खेल: रूसी डिस्काउंट पर फिदा हमारी सरकार!

नमस्कार दर्शकों! ‘काक-वाणी’ में आपका स्वागत है, जहां हम खबरों को सीधे नहीं, बल्कि अपनी टेढ़ी चोंच से खंगालकर परोसते हैं। आज की सबसे बड़ी खबर यह है कि वैश्विक विशेषज्ञों ने एक महान खोज की है। उनका कहना है कि भारत जो ताबड़तोड़ रूसी तेल खरीद रहा है, उसके पीछे कोई महान ‘भू-राजनीति’ नहीं, बल्कि सिर्फ ‘पैसा’ यानी ‘सस्ता दाम’ है। अरे वाह! इस अद्भुत रहस्योद्घाटन के लिए इन विशेषज्ञों को तुरंत कोई बड़ा पुरस्कार दिया जाना चाहिए। हमारे नीति-निर्माताओं को तो जैसे पता ही नहीं था कि सस्ता माल खरीदना फायदेमंद होता है!

विश्व गुरु की तेल-कूटनीति: राजनीति नहीं, यह तो शुद्ध ‘सस्ता रोना’ है

हमारी नरेंद्र मोदी सरकार के समर्थक दिन-रात टीवी चैनलों पर छाती ठोककर बताते हैं कि कैसे भारत की विदेश नीति ने अमेरिका और यूरोप को घुटनों पर ला दिया है। लेकिन सच तो यह है कि जैसे ही किसी मॉल में ‘फ्लैट 50% ऑफ’ का बोर्ड देखकर भीड़ उमड़ पड़ती है, वैसे ही रूसी तेल पर डिस्काउंट देखकर हमारी सरकार भी कूपन कोड ढूंढने निकल पड़ी। इसमें कोई कूटनीति नहीं, बल्कि विशुद्ध बनिया-बुद्धि है। जब रूस ने यूक्रेन युद्ध के बीच कहा, “सस्ता ले लो भाई”, तो हमारे अधिकारियों ने ‘वैश्विक शांति’ के सिद्धांतों को तुरंत लॉकर में बंद किया और ड्रम लेकर कतार में लग गए। वैश्विक प्रतिबंध जाएं तेल लेने, हम तो तेल ही लाएंगे!

सस्ता तेल रूस से आया, पर जनता के नसीब में तो ‘चूना’ ही आया

अब आप अपनी मासूम बुद्धि से सोच रहे होंगे कि जब नरेंद्र मोदी सरकार ने इतना सस्ता कच्चा तेल खरीदा है, तो आपके शहर के पेट्रोल पंप पर कीमतें कम क्यों नहीं हुईं? हुजूर, आप सचमुच नादान हैं! यह ‘काक-वाणी’ है, यहां आपको हकीकत का आईना देखना होगा। दरअसल, यह सस्ता तेल देश के आम नागरिकों की जेब को राहत देने के लिए नहीं खरीदा गया था। यह तो हमारे देश के चंद ‘खास’ कॉर्पोरेट मित्रों की रिफाइनरियों के चमचमाते मुनाफे के लिए था। वे रूस से कौड़ियों के भाव तेल खरीदते हैं, उसे रिफाइन करते हैं, और फिर उसी यूरोप को दोगुने दाम पर बेच देते हैं जो हमें उपदेश दे रहा था। इसे कहते हैं असली ‘आपदा में अवसर’!

कौए की नजर से सच: आम जनता का तेल निकलना जारी है

तो लब्बोलुआब यह है कि भारत की तेल नीति न तो रूस के प्रति किसी पुराने प्यार पर टिकी है और न ही अमेरिका के डर पर। यह सिर्फ इस बात पर टिकी है कि कौन कितना सस्ता दे सकता है। बस अफसोस इस बात का है कि इस ‘सस्ते खेल’ का सारा मलाईदार फायदा सरकारी खजाने और बड़े घरानों को मिल रहा है, जबकि देश का आम आदमी आज भी सौ रुपये लीटर पेट्रोल डलवाकर अपनी देशभक्ति का प्रमाण दे रहा है। बोलते रहिए ‘भारत माता की जय’ और अपनी खाली जेब सहलाते रहिए!


संदर्भ मुख्य समाचार: यहाँ देखें

कागा जी