विदेशी अखबार ‘द गार्जियन’ ने हाल ही में एक बड़ी अजीबोगरीब खबर छापी है। वे कहते हैं कि भारत की महिलाएं बदलाव और सुरक्षा के लिए ‘अधीर’ (impatient) हो रही हैं। अब भला बताइए, यह भी कोई बात हुई? हमारे देश में सदियों से महिलाओं को ‘देवी’ मानकर पूजने की महान परंपरा रही है। अब भला देवियों में इतना अधैर्य शोभा देता है क्या? हमारे माननीय नेताओं को ही देख लीजिए, वे कितने धैर्यवान हैं। हाथरस हो, मणिपुर हो या कोलकाता, वे हर संवेदनशील मुद्दे पर गहरी और लंबी चुप्पी साधने का अद्भुत धैर्य दिखाते हैं।
चुनावी रैलियों के बीच यह ‘अधैर्य’ कैसा?
महिलाएं शिकायत कर रही हैं कि उन्हें सुरक्षा चाहिए, न्याय चाहिए, और वह भी तुरंत! अजी, जरा रुकिए। क्या आपको नहीं पता कि हमारे भारतीय राजनीतिक दल इस समय बहुत ही महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्यों में व्यस्त हैं? अभी एक राज्य का चुनाव खत्म नहीं होता कि दूसरे की तैयारी शुरू हो जाती है। रैलियों में भीड़ जुटानी है, विरोधी दलों पर कीचड़ उछालना है, और मुफ्त के वादों के रंग-बिरंगे गुब्बारे उड़ाने हैं। न्याय पाने के लिए कुछ साल कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटना और अंतहीन जांच समितियों का इंतजार करना तो हमारी व्यवस्था की रीढ़ है। इस पवित्र प्रशासनिक सुस्ती को आप ‘अधैर्य’ कहकर बदनाम नहीं कर सकतीं।
एक तरफ हमारे नेताजी मंच से गरजते हुए ‘नारी शक्ति’ का नारा देते हैं, दूसरी तरफ ये अधीर महिलाएं सड़कों पर कैंडल मार्च निकालकर उनके भाषणों की टाइमिंग खराब कर देती हैं। क्या इन्हें गृह मंत्री जी के उस डिजिटल आश्वासन पर भरोसा नहीं है, जहां कागजों पर सब सुरक्षित है? महिलाओं को समझना चाहिए कि जब देश में इंटरनेट धीमा हो सकता है, तो न्याय की गति बुलेट ट्रेन जैसी कैसे हो सकती है?
शांति रखिए, अगला घोषणापत्र आने वाला है!
हमारी इन व्याकुल बहनों को ‘काक-वाणी’ की ओर से मुफ्त सलाह है: कृपया अपनी इस अधीरता को काबू में रखें। आपकी सुरक्षा और सम्मान का पुख्ता इंतजाम अगले चुनाव के घोषणापत्र (Manifesto) में स्वर्णिम अक्षरों में फिर से किया जाएगा। तब तक के लिए आप टीवी चैनलों पर चल रही तीखी बहसों को देखकर अपना मनोरंजन कीजिए, जहां सत्ताधारी दल के प्रवक्ता आपको बड़ी आत्मीयता से समझाएंगे कि आपके राज्य से ज्यादा असुरक्षित तो पड़ोसी देश या विरोधी दल शासित राज्य है। इसलिए, ‘अधीर’ होना बंद कीजिए और हमारे कर्मठ नेताओं को अपनी चुनावी पिकनिक का आनंद लेने दीजिए। आखिर लोकतंत्र का असली मजा तो इसी में है!
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