सुंदरवन की एक भावुक दास्तान
सुंदरवन के घने जंगलों में गजराज नाम का एक विशालकाय हाथी रहता था। वह अपनी युवावस्था में पूरे जंगल का स्वाभिमान माना जाता था। उसकी एक गर्जना से हिंसक पशु भी सहम जाते थे। परंतु, समय चक्र बदला और गजराज बूढ़ा हो गया। उसकी आँखों की रोशनी कमजोर हो गई थी और विशाल शरीर अब ढल चुका था। ताकत खत्म होते ही उसके अपने झुंड ने भी उसे अकेला छोड़ दिया था। अकेलापन, निराशा और वेदना गजराज के जीवन का सच बन चुकी थी।
एक छोटी चिड़िया का आगमन
उसी विशाल बरगद के पेड़ पर, जिसके नीचे गजराज विश्राम करता था, ‘चीकू’ नाम की एक छोटी सी गौरैया का घोंसला था। चीकू रोज़ गजराज की आँखों से गिरते आँसुओं को देखती थी। एक दिन उसने गजराज के कान के पास जाकर कहा, “बाबा! आप इतने उदास क्यों रहते हैं?” गजराज ने एक गहरी सांस लेकर कहा, “जब तक शरीर में बल था, सब मेरे आगे-पीछे थे। आज मैं बेबस हूँ, तो सबने मुंह मोड़ लिया।” चीकू ने बहुत प्रेम से कहा, “शरीर का बल खत्म हो सकता है बाबा, लेकिन आत्मा का प्रेम नहीं। आज से मैं आपकी बेटी और मित्र हूँ।”
जंगल की भीषण आग और परीक्षा
दिन बीतते गए और चीकू व गजराज का रिश्ता अटूट होता गया। चिड़िया बूढ़े हाथी को मीठे फल और जल स्रोत तक पहुँचाती, और हाथी अपनी सूंड से उसे धूप और बारिश से बचाता। एक दोपहर, भीषण गर्मी के कारण जंगल में भयानक आग लग गई। हवा के साथ आग की लपटें तेजी से फैलने लगीं। सभी शक्तिशाली जानवर अपनी जान बचाकर भागने लगे। धुएं और कमजोर आँखों के कारण गजराज भाग नहीं पा रहा था। उसने चीकू से रोते हुए कहा, “बेटी, तुम उड़ जाओ और अपनी जान बचाओ। मेरा अंत समय आ गया है।”
एकता और प्रेम की विजय
चीकू ने भागने से साफ इंकार कर दिया। उसने तुरंत अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दिया। चीकू उड़कर जंगल की सभी चींटियों और पक्षियों के पास गई और उनसे मदद मांगी। हज़ारों चींटियों ने मिलकर सूखी पत्तियों को हटाकर एक सुरक्षित रास्ता चिन्हित किया और मधुमक्खियों ने हवा में भिनभिनाकर गजराज को सही दिशा का संकेत दिया। चीकू गजराज के मस्तक पर बैठकर उसे धीरज देती रही। अपनी नन्हीं मित्र के इस असीम प्रेम को देखकर गजराज में जीने का नया साहस आ गया। चीकू के मार्गदर्शन में गजराज सुरक्षित नदी के पार पहुँच गया।
नैतिक शिक्षा
नैतिक शिक्षा: पंचतंत्र की यह नैतिक कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची मित्रता और संबंध कभी शारीरिक आकार या ताकत पर निर्भर नहीं करते। संकट के समय बड़ा शरीर नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम, बुद्धिमत्ता और एकता ही सबसे बड़ी रक्षा बनती है।