पर्दा या प्रोपेगैंडा? जानिए कैसे बदल रही है बॉलीवुड की दुनिया!

नमस्कार दोस्तों! ‘काक-वाणी’ के एक और तीखे और चटपटे अंक में आपका स्वागत है। कभी आपने सोचा है कि थियेटर में पॉपकॉर्न चबाते हुए आप जो फिल्म देख रहे हैं, वह सिर्फ एक मनोरंजन की कहानी है या आपके दिमाग में कोई खास सोच डालने की कोशिश? हाल ही में ‘डेक्कन हेराल्ड’ में छपी एक रिपोर्ट ने बॉलीवुड और प्रोपेगैंडा के इसी गहरे कनेक्शन पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

फ्रांसीसी विचारक ‘एल्लुल’ का सिद्धांत और हमारा बॉलीवुड

रिपोर्ट में मशहूर फ्रांसीसी समाजशास्त्री जैक एल्लुल (Jacques Ellul) के उस प्रसिद्ध सिद्धांत का जिक्र किया गया है, जिसमें वे कहते हैं कि आधुनिक समाज में ‘प्रोपेगैंडा’ केवल नारों या भाषणों तक सीमित नहीं होता। यह हमारे रोजमर्रा के मनोरंजन का हिस्सा बनकर बहुत ही धीरे-धीरे हमारी सोच को बदलने लगता है। आज का भारतीय सिनेमा इसी ‘एल्लुलियन ईको’ यानी एल्लुल के सिद्धांत की जीती-जागती मिसाल बनता दिख रहा है।

रोमांस और एक्शन के बीच कहां गया सच्चा सिनेमा?

एक दौर था जब बॉलीवुड में ‘राहुल… नाम तो सुना होगा’ जैसे प्यार भरे संवाद या फिर मसालेदार एक्शन फिल्में छाए रहते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में बॉक्स ऑफिस का गणित पूरी तरह बदल चुका है। अब देशभक्ति, ऐतिहासिक पुनर्गठन और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों पर आधारित फिल्मों की बाढ़ सी आ गई है।

कुछ दर्शक और समीक्षक इसे ‘सच्चे इतिहास और राष्ट्रवाद’ का जश्न मानते हैं, तो वहीं दूसरा वर्ग इसे सीधे तौर पर ‘चुनावी और राजनीतिक एजेंडा’ की संज्ञा देता है। आज की फिल्में सिर्फ कहानियां नहीं सुनातीं, वे दर्शकों के दिमाग में एक खास ‘नैरेटिव’ गढ़ती हैं। थियेटर से बाहर निकलने वाला दर्शक सिर्फ सिनेमा का आनंद लेकर नहीं निकलता, बल्कि किसी न किसी विचारधारा का समर्थक या विरोधी बनकर बाहर आता है।

काक-वाणी की खास सलाह: कला देखें, एजेंडा नहीं!

सिनेमा हमेशा से समाज का आईना रहा है, लेकिन जब आईना ही यह तय करने लगे कि आपको खुद को कैसे देखना है, तब सवाल उठना लाजिमी है। क्या बॉलीवुड अब दर्शकों की भावनाओं को भुनाकर अपना काम निकाल रहा है?

अरे भइया! ‘काक-वाणी’ तो बस यही कहेगी कि अगली बार जब थियेटर की टिकट कटाएं, तो अपनी ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ यानी सोचने-समझने की क्षमता का चश्मा जरूर पहनकर जाएं। फिल्में देखिए, गानों पर झूमिए और कला का आनंद लीजिए, लेकिन अपनी सोच की बागडोर किसी पर्दे के हाथ में मत सौंपिए!


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कागा जी