सज्जनों, अगर आपको लगता था कि भारत सिर्फ अपनी घरेलू राजनीति के ‘दंगल’ और चुनावी जुमलों के लिए मशहूर है, तो आप कतई गलत हैं। अब हमारा प्यारा भारत वैश्विक कूटनीति का वह ‘प्यार का पंचनामा’ बन चुका है, जहां दुनिया भर के रूठे हुए राष्ट्रध्यक्ष आकर अपनी दूरियां मिटाते हैं। ताजा मामला ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस के बीच का है, जिन्होंने भारत की पावन भूमि पर मुलाकात कर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पंडितों को सिर खुजलाने पर मजबूर कर दिया है।
खाड़ी का पानी और दिल्ली की ‘चाय’: एक अनोखा कूटनीतिक संगम
तस्नीम समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मुलाकात किसी गंभीर द्विपक्षीय बैठक से अधिक एक ‘पारिवारिक मिलन समारोह’ जैसी लग रही थी। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), जिनके आपसी संबंध अमूमन वैसे ही रहते हैं जैसे हमारे यहां सास और बहू के, वे अचानक नई दिल्ली की हवाओं में एक-दूसरे पर मुस्कुराते नजर आए। काक-वाणी के गुप्त सूत्रों की मानें तो, जो मसले जिनेवा और न्यूयॉर्क के आलीशान वातानुकूलित कमरों में सालों-साल नहीं सुलझते, वे भारत के समोसे और कड़क अदरक वाली कूटनीतिक चाय की मेज पर चंद मिनटों में सुलझ जाते हैं!
विश्वगुरु का ‘ग्लोबल मैरिज ब्यूरो’ और तीसरे अंपायर की भूमिका
मसूद पेज़ेश्कियान साहब ने शायद सोचा होगा कि तेहरान की पाबंदियों और पश्चिम के तनाव से दूर, भारत की कूटनीतिक ‘पिच’ पर बैटिंग करना ज्यादा सुरक्षित है। वहीं अबू धाबी के क्राउन प्रिंस भी यह भांप गए कि जब तेल से ज्यादा तकनीक और दोस्ती का बाजार गर्म हो, तो भारत से बेहतर कोई तीसरा अंपायर हो ही नहीं सकता। इस मुलाकात को देखकर लग रहा है कि भारतीय विदेश मंत्रालय अब ‘ग्लोबल मैरिज ब्यूरो’ की तरह काम कर रहा है, जहां ‘रूठे हुए पड़ोसियों को मिलाएं’ योजना के तहत विशेष कूटनीतिक डिस्काउंट दिया जा रहा है।
वैसे, इस ऐतिहासिक मुलाकात की तस्वीरें देखकर ऐसा लग रहा था मानो दो बिछड़े हुए भाई बरसों बाद किसी भारतीय मेले में मिल रहे हों। पेज़ेश्कियान साहब के चेहरे की चमक और क्राउन प्रिंस की गर्मजोशी देखकर वाशिंगटन में बैठे साहबों को थोड़ी जलन तो जरूर हुई होगी।
काक-वाणी का अंतिम ज्ञान
अंत में, काक-वाणी का यही मशविरा है कि अब संयुक्त राष्ट्र (UN) की इमारतों को किराए पर दे देना चाहिए और अगली बार जब भी दुनिया में कोई युद्ध या विवाद हो, तो सीधे दिल्ली का टिकट कटवाना चाहिए। यहां का प्रदूषण भले ही फेफड़ों के लिए हानिकारक हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंधों को यह एक अनोखी ‘ऑक्सीजन’ जरूर प्रदान करता है। खाड़ी के सुलगते रेगिस्तान को ठंडा करने के लिए आखिर गंगा-जमुना की तहज़ीब ही काम आई!
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