भूगोल ने तो जोड़ दिया था, धन्यवाद कहिए राजनीति का जिसने बचा लिया!

नमस्कार! मैं ‘काक-वाणी’ का वही पुराना कौआ हूँ, जो सत्ता के गलियारों की मुंडेर पर बैठकर नीचे चल रहे शानदार तमाशे पर निष्पक्ष काँव-काँव करता है। हाल ही में एक समाचार पत्र ‘द हिंदू’ ने एक बड़ी ही मार्मिक और गहरी पंक्ति लिखी— “भूगोल से बंधे, राजनीति से बंटे।” अहा! यह पढ़कर मेरी कौआ-आँखें नम हो गईं। जरा सोचिए, अगर हमारी राजनीति इतनी कर्मठ न होती, तो इस मूर्ख भूगोल ने तो हमें एक ही धागे में पिरोकर रख दिया था!

प्रकृति की नादानी और नेताओं का सुधार कार्य

देखा जाए तो कुदरत बहुत ही अनपढ़ और गैर-जिम्मेदार है। उसे चुनाव आयोग, वोट बैंक और चुनावी घोषणापत्रों की रत्ती भर समझ नहीं है। उसने नदियाँ बहा दीं, बिना यह पूछे कि किस राज्य या देश को कितना प्रतिशत पानी देना है। उसने एक जैसे पहाड़ खड़े कर दिए और दोनों तरफ रहने वाले इंसानों को एक जैसी मिट्टी, धूप और हवा सौंप दी। यह तो कुदरत की सरासर नादानी थी!

भला हो हमारे परम आदरणीय राजनीतिज्ञों का, जिन्होंने प्रकृति की इस ऐतिहासिक भूल को सुधारा। अगर हमारे दूरदर्शी नेता न होते, तो पड़ोसी राज्य और पड़ोसी देश के लोग तो आपस में भाई-चारा निभाते-निभाते ऊब चुके होते।

एक ही नदी, अनेक चुनावी नफरत

हमारे नेताओं की इंजीनियरिंग की दाद देनी पड़ेगी। भूगोल ने दो इलाकों को एक नदी से जोड़ा था, लेकिन राजनीति ने उस पानी को चुनावी मौसम में दो अलग-अलग राज्यों के लिए नफरत का सिरका बना दिया। चुनाव आते ही एक तरफ का पानी दूसरे तरफ के लिए ‘अधिकारों की डकैती’ बन जाता है। जो भाषा, जो संस्कृति और जो ज़मीन लोगों को आपस में बाँधती थी, आज उसी ज़मीन पर ‘इंच-इंच’ की राजनीति का बोर्ड टँग चुका है।

विभाजन न होता, तो किस बात पर वोट माँगते?

ज़रा ठंडे दिमाग से सोचिए! अगर राजनीति भूगोल की इस बेवकूफी को न सुधारती, तो हमारे राजनेता रैलियों में क्या भाषण देते? क्या वे विकास, अस्पताल, स्कूल और महंगाई जैसे उबाऊ और थकाऊ मुद्दों पर बात करते? छिः! ऐसे बोरिंग मुद्दों पर भला कौन वोट देता है?

यह तो हमारे नेताओं की महानता है कि वे एक ही भूगोल में साँस लेने वाले लोगों को भाषा, क्षेत्र, पानी और सीमा के नाम पर बड़ी ही कुशलता से बाँट देते हैं। इसलिए, जब भी आप अपने पड़ोसी से लड़ें, तो भूगोल को कोसिए जिसने आपको पास ला दिया, और नेताओं को धन्यवाद दीजिए जिन्होंने आपको सुरक्षित दूरी पर रखा है। काँव-काँव!


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कागा जी