वाह! क्या दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई है कांग्रेस को। दशकों तक देश को अपने ‘मन की बात’ (या कहें तो एकतरफा भाषण) सुनाने वाली राजनीति के बीच अचानक एक नया नैरेटिव बाजार में उतरा है। कांग्रेस का कहना है कि राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ कोई प्रवचन सत्र नहीं था, जहाँ वे माइक पकड़कर अपने मन की भड़ास निकालते, बल्कि यह तो जनता की ‘चिंता’ सुनने का एक पावन अनुष्ठान था। ‘काक-वाणी’ इस ऐतिहासिक खुलासे पर नतमस्तक है।
रेडियो स्टेशन बनाम सड़क का फुटपाथ
सालों-साल सत्ता के सिंहासन पर बैठकर देश को ‘निर्देश’ देने वाली पार्टी के युवराज अचानक ‘श्रोता’ बन गए, यह चमत्कार किसी त्रेतायुगीन घटना से कम नहीं है। जहाँ एक तरफ देश के प्रधान सेवक हर रविवार को रेडियो पर आकर देशवासियों को यह बताते हैं कि उन्हें खिलौने कैसे बनाने चाहिए और परीक्षा के तनाव से कैसे बचना चाहिए, वहीं हमारे राहुल बाबा ने सोचा—’चलो, हम सिर्फ सुनेंगे!’ अब यह अलग बात है कि सुनने के इस महायज्ञ के लिए उन्हें टी-शर्ट पहनकर हजारों किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। आखिर बिना कैमरों और भारी सुरक्षा बल के जनता की चिंताएँ ठीक से सुनाई जो नहीं देतीं!
सुनने की कला और दाढ़ी का सस्पेंस
कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि राहुल जी ने यात्रा के दौरान केवल धूल नहीं फांकी, बल्कि जनता के आंसुओं को सोखा है। सच ही तो है, जब कोई नेता घनी दाढ़ी बढ़ाकर, गंभीर चेहरा बनाकर आपकी बात सुनता है, तो आधी चिंता तो वैसे ही दूर हो जाती है। जनता भी धन्य हो गई कि चलो, कोई तो है जो चुनाव के बिना भी हाथ मिलाने और गले लगाने आ रहा है। लेकिन दुष्ट लोग फिर भी पूछ रहे हैं कि बाबा ने इतने महीनों में आखिर सुना क्या? क्या उन्होंने बेरोजगारी की चिंता सुनी या अपनी पार्टी के बिखरते कुनबे की? खैर, नकारात्मक लोगों का काम ही शंका करना है।
सद्बुद्धि का नया सवेरा
काक-वाणी का मानना है कि इस यात्रा ने कम से कम यह तो साबित कर दिया कि राजनीति में अब ‘बोलने’ से ज्यादा ‘सुनने’ का नाटक करना फायदेमंद है। जो पार्टी कभी जनता की आवाज को ‘इमरजेंसी’ के शोर में दबा दिया करती थी, आज वह ‘महान श्रोता’ होने का दावा कर रही है। उम्मीद है कि अगली बार जब राहुल जी संसद में बोलेंगे, तो उसमें केवल ‘जनता की चिंता’ होगी, न कि ‘आलू से सोना’ बनाने जैसी वैज्ञानिक खोजें। तब तक के लिए, सुनते रहिए, क्योंकि बोलना तो वैसे भी मना है!
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