माटी का दिया और जीवन का परम सत्य

बहुत पुरानी बात है, चंबल नदी के किनारे बसे एक सुंदर गांव में सोमेश नाम का एक धनवान युवक रहता था। उसके पास धन, संपत्ति और मान-सम्मान सब कुछ था, लेकिन फिर भी उसका मन हमेशा अशांत रहता था। वह अक्सर सोचता कि आखिर इस जीवन का अंतिम सच क्या है? इंसान जीवन भर क्यों भागता है और अंत में उदास होकर खाली हाथ चला जाता है?

सत्य की खोज और महात्मा का आश्रम

अपने प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए सोमेश गांव के पास वाली पहाड़ी पर रहने वाले एक वृद्ध और ज्ञानी संन्यासी के पास गया। उसने संन्यासी के चरणों में गिरकर भावुक स्वर में कहा, “हे गुरुदेव! मुझे जीवन का सबसे बड़ा सच जानना है। ऐसा सच जो मुझे भीतर की इस शून्यता और दुख से मुक्त कर दे।”

संन्यासी ने सोमेश की आंखों में छिपे दर्द को देखा। वे मुस्कुराए और अपनी कुटिया के भीतर से मिट्टी का एक जलता हुआ दिया लेकर बाहर आए।

मिट्टी का दिया और कठिन शर्त

संन्यासी ने वह दिया सोमेश के कांपते हाथों में थमाते हुए कहा, “मैं तुम्हें जीवन का सच अवश्य बताऊंगा, लेकिन उससे पहले तुम्हें मेरी एक शर्त पूरी करनी होगी। इस जलते हुए दिए को लेकर तुम्हें पूरे गांव का एक चक्कर लगाकर वापस आना है। शर्त यह है कि दिए की लौ बुझनी नहीं चाहिए, वरना तुम सत्य को कभी नहीं जान पाओगे।”

सोमेश ने अत्यंत सावधानी से दिया संभाला और गांव की ओर चल पड़ा। उस दिन तेज हवाएं चल रही थीं। सोमेश का पूरा ध्यान केवल उस जलते दिए पर ही अटक गया। वह अपनी हथेलियों से हवा को रोकता, फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाता और हर पल इसी डर में जीता रहा कि कहीं ज्योति बुझ न जाए।

खोई हुई सुंदरता और ज्ञान की प्राप्ति

करीब दो घंटे की कठिन मशक्कत के बाद सोमेश वापस पहाड़ी पर पहुंचा। दिए की लौ अभी भी जल रही थी। उसने राहत की सांस ली। संन्यासी ने मुस्कुराते हुए पूछा, “पुत्र! जब तुम गांव में घूम रहे थे, तो तुमने क्या देखा? आज तो गांव में त्यौहार था, बच्चे हंस रहे थे, पंछी चहचहा रहे थे और कुम्हार मिट्टी के सुंदर बर्तन बना रहा था। क्या तुमने उन दृश्यों का आनंद लिया?”

सोमेश ने उदास होकर सिर झुका लिया और कहा, “नहीं गुरुदेव! मेरा सारा ध्यान तो बस इस बात पर था कि कहीं दिया बुझ न जाए। इस डर के कारण मैंने आसपास कुछ देखा ही नहीं।”

तभी संन्यासी ने सौम्यता से कहा, “यही तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा सच है!”

जीवन का परम सच

संन्यासी ने गहराई से समझाते हुए कहा, “यह माटी का दिया तुम्हारा जीवन है और इसकी लौ तुम्हारी सांसें हैं। तुम केवल भविष्य के डर और दुखों से बचने की चिंता में इस लौ को बचाने में इतने उलझ गए कि तुमने आसपास की सुंदरता, रिश्तों का प्रेम और जीवन के आनंद को देखना ही छोड़ दिया। दिए की लौ को बचाना ज़रूरी है, लेकिन उसके चक्कर में जीना भूल जाना सबसे बड़ी भूल है।”

सोमेश को अपनी गलती का अहसास हो चुका था। उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े और उसके मन का सारा भारीपन पल भर में मिट गया।

कहानी की सीख

सीख: जीवन का सच्चा अर्थ केवल परेशानियों से डरकर जीवित रहने में नहीं है। जिम्मेदारियों और कठिनाइयों को संभालते हुए, वर्तमान के हर एक पल को पूरी आत्मीयता और आनंद के साथ जीना ही जीवन का वास्तविक सत्य है।

कागा जी