राजनीति से परे भारत-ईरान का ‘रूहानी’ गठबंधन: जब मोदी मिले पेज़ेश्कियान से!

वाह! क्या बात कही है ईरानी विशेषज्ञ महोदय ने। जब उन्होंने कहा कि ‘भारत और ईरान के रिश्ते राजनीति से परे हैं’, तो कूटनीति के गलियारों में बैठे हमारे पुराने बाबुओं की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। राजनीति से परे? यानी अब नई दिल्ली और तेहरान के बीच केवल रूहानी और आध्यात्मिक बातें होंगी? क्या अब चाबहार बंदरगाह पर व्यापार के बजाय सिर्फ सूफी संगीत बजेगा और कच्चे तेल के पाइपों से केवल मोहब्बत का नूर बहेगा?

आध्यात्मिक कूटनीति का नया अवतार

ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के मंच पर जब हमारे परम तेजस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के नए नवेले राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान आपस में मिले, तो कैमरों की फ्लैशलाइट्स ऐसे चमकीं जैसे दुनिया की सारी समस्याएं उसी पल हल होने वाली हों। ईरानी विशेषज्ञ का यह कहना कि ‘रिश्ते राजनीति से परे हैं’, दरअसल हमारी उस कूटनीतिक कला पर मुहर लगाता है जहां हम काम न होने पर भी उसे ‘सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध’ घोषित करके ताली बजवा लेते हैं।

जब अमेरिकी पाबंदियों के डर से भारत ईरान से सीधे तेल खरीदना बंद कर देता है, तब भी हमारा यह ‘बियॉन्ड पॉलिटिक्स’ वाला प्यार कम नहीं होता। यह तो बिल्कुल वैसा ही है जैसे दो पुराने दोस्त कहें, “भाई, संकट के समय पैसे तो नहीं दे सकता, पर व्हाट्सएप पर ‘ऑल द बेस्ट’ का मैसेज रोज सुबह भेजता रहूंगा!”

चाबहार पोर्ट: कछुए की रफ्तार और रूहानी इकरार

इस रूहानी रिश्ते का सबसे बड़ा जीवंत उदाहरण है ‘चाबहार बंदरगाह’। वर्षों से इस पर इतनी धीमी रफ्तार से काम चल रहा है कि कछुआ भी इसे देखकर डिप्रेशन में आ जाए। लेकिन चिंता की क्या बात है? जब रिश्ता राजनीति और समय-सीमा से ऊपर उठ चुका हो, तो फिर डेडलाइन की परवाह कौन करे? चीनी निवेश भले ही ईरान में धड़ाधड़ पैर पसार रहा हो, लेकिन भारत का जो ‘बिना शर्त’ और ‘काम टालने’ वाला निश्छल प्रेम है, उसकी तुलना किसी चीनी कर्ज से नहीं की जा सकती।

काक-वाणी का मानना है कि इस ‘बियॉन्ड पॉलिटिक्स’ फॉर्मूले को अब घरेलू राजनीति में भी लागू किया जाना चाहिए। कल को जब जनता महंगाई और बेरोजगारी पर सवाल पूछे, तो सरकार को मुस्कुराकर कह देना चाहिए—”जनता और हमारा रिश्ता इन तुच्छ भौतिक चीजों से ऊपर उठ चुका है, कृपया इसमें नौकरी और राशन जैसी ‘राजनीति’ न लाएं!”


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कागा जी