रीलराज में विदा होते ‘माननीय’: जब राजनीति का ‘क्रिंज’ झेलने से जेन-जी ने किया इनकार

एनडीटीवी के एक ओपिनियन ने हमारे देश के सत्तर पार वाले नेताओं की रातों की नींद हराम कर दी है। खबर आई है कि भारत की ‘जेन-जी’ (Gen Z) यानी आज की युवा पीढ़ी को हमारी पारंपरिक, संस्कारी और जाति-धर्म के तड़के वाली राजनीति से अब कोई ‘लव’ नहीं रह गया है। अब भला बताइए, इसमें उस बेचारे नेता जी की क्या गलती है जो पिछले चालीस सालों से एक ही सफेद कुर्ता पहनकर, एक ही मंच से, वही पुराना घिसा-पिटा भाषण दे रहे हैं? गलती तो असल में इस नई पीढ़ी की है, जिसे हर चीज में तुरंत संतुष्टि चाहिए और जो 15 सेकंड की ‘रील’ में पूरी क्रांति की उम्मीद रखती है!

भाषणों का ‘बोरिंग’ दौर और जेन-जी का ‘स्वाइप लेफ्ट’

काक-वाणी के विशेष राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, हमारे भारतीय राजनेता इस वक्त गहरे अस्तित्व के संकट में हैं। वे सोच रहे थे कि इस बार भी वे ‘विकास’ की झूठी बातें या ‘भावनात्मक कार्ड’ खेलकर युवाओं को बहला लेंगे। लेकिन हाय रे फूटी किस्मत! जेन-जी को तो इन भारी-भरकम शब्दों में कोई ‘वाइब’ ही नजर नहीं आती। उनके लिए तो देश के बड़े-बड़े नीतिगत भाषण सिर्फ ‘क्रिंज’ और ‘देजा वू’ हैं। जिस पीढ़ी का ध्यान केवल एक इंस्टाग्राम रील की अवधि तक टिकता हो, उसे आप दो घंटे का उबाऊ भाषण कैसे सुना सकते हैं? नेता जी मंच पर गला फाड़कर चिल्लाते रह जाते हैं, और उधर युवा अपने फोन पर ‘स्वाइप लेफ्ट’ करके आगे बढ़ जाता है।

जब ‘घोषणापत्र’ से ज्यादा जरूरी हो गया ‘एस्थेटिक’

अब अगर हमारे पुराने नेताओं को नए वोट चाहिए, तो उन्हें नीति आयोग की मोटी फाइलों को छोड़कर यह समझना होगा कि ‘नो कैप’, ‘सिचुएशनशिप’ और ‘डेलुलु’ का असल मतलब क्या होता है। पुरानी राजनीति में जहां बाहुबल और धनबल का सिक्का चलता था, वहीं आज की जेन-जी को सिर्फ ‘सिग्मा मेल’ एटीट्यूड और ‘एस्थेटिक’ बैकग्राउंड की तलाश है। अगर कोई नेता संसद में सोता हुआ पाया गया, तो वह नीतिगत विफलता नहीं, बल्कि एक नया ‘मीम टेम्पलेट’ बनकर वायरल हो जाता है। इस पीढ़ी के लिए राजनीति कोई देश सुधारने का गंभीर जरिया नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करने वाली एक और टाइमपास कैटेगरी बन चुकी है।

भविष्य की राजनीति: रैलियों की जगह ‘कोलाब पोस्ट’

अंत में, काक-वाणी हमारे आदरणीय राजनेताओं को एक मुफ्त की सलाह देना चाहती है। अगर जेन-जी को वापस राजनीति के जाल में फंसाना है, तो रैलियों में मुफ्त की बिरयानी और बसें भेजना बंद कीजिए। उसके बदले मुफ्त वाई-फाई और इंस्टाग्राम पर ‘कोलाबोरेटर पोस्ट’ का ऑफर दीजिए। जब तक संसद की बहसों में बैकग्राउंड संगीत और ट्रेंडी ट्रांजिशन इफेक्ट्स का इस्तेमाल नहीं होगा, तब तक यह पीढ़ी आपकी तरफ मुड़कर भी नहीं देखेगी। अब देखना यह है कि कौन सा समझदार नेता सबसे पहले ‘संसद ब्लॉग: डे 1’ नाम से अपनी रील बनाकर देश सेवा का नया ड्रामा शुरू करता है!


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कागा जी