स्वागत है आपका ‘काक-वाणी’ के विशेष स्तंभ ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ में। आज हम बात करेंगे उन महान शोधकर्ताओं की, जो प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि सुबह-सुबह चाय की चुस्की के साथ ‘फॉरवर्डेड ऐज रिसीव्ड’ वाले मैसेज बनाकर मानव कल्याण में जुटे हैं। इन स्वयंभू वैज्ञानिकों ने ऐसे-ऐसे नुस्खे और दावे खोज निकाले हैं कि बेचारे नासा और नोबेल प्राइज वाले भी कोने में बैठकर रो रहे होंगे। आइए, आज इस ‘ज्ञानगंगा’ के कुछ प्रमुख दावों की कड़वी सच्चाई का पोस्टमार्टम करते हैं।
दावा नंबर १: यूनेस्को ने हमारे राष्ट्रगान को ‘सर्वश्रेष्ठ’ घोषित किया
यह दावा उतना ही अमर है जितने अमर चित्र कथा के किरदार। हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के आते ही, यूनेस्को के मुख्यालय (पेरिस) से एक गुप्त ईमेल सीधे हमारे व्हाट्सएप ग्रुप के एडमिन के पास पहुंचता है। दावा होता है कि भारत के राष्ट्रगान को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रगान चुना गया है। सच तो यह है कि यूनेस्को के पास ऐसे प्रतियोगिताएं आयोजित करने का समय ही नहीं है। लेकिन हमारे देश के राष्ट्रभक्तों को जब तक इस मैसेज को दस लोगों को फॉरवर्ड करके ‘जय हिंद’ न लिख लें, तब तक उनका खाना हजम नहीं होता।
दावा नंबर २: गरम पानी और नींबू से कैंसर का अचूक इलाज
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक दशकों से माथापच्ची कर रहे हैं और अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं। लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के डीन ने इसका तोड़ चुटकियों में निकाल लिया – ‘सुबह खाली पेट गर्म पानी में नींबू निचोड़ कर पिएं, कैंसर जड़ से खत्म!’ वाह! इस क्रांतिकारी खोज के बाद तो बड़े-बड़े कैंसर अस्पतालों को ताला लगा देना चाहिए और कीमोथेरेपी की जगह नींबू की रेहड़ी लगा लेनी चाहिए। सच यह है कि नींबू सेहत के लिए अच्छा है, लेकिन यह कैंसर का इलाज कतई नहीं है। कृपया असली डॉक्टर से ही सलाह लें, व्हाट्सएप वाले ‘चमन लाल एम.डी.’ से नहीं।
दावा नंबर ३: नासा ने अंतरिक्ष में सुनी ‘ॐ’ की आवाज
नासा के अंतरिक्ष यात्री जब ब्रह्मांड की सैर पर निकले, तो उन्हें वहां कोई एलियन नहीं मिला, बल्कि ‘ॐ’ की गूंज सुनाई दी! इस दावे को पढ़कर खुद नासा के वैज्ञानिक भी हैरान-परेशान हैं। विज्ञान कहता है कि अंतरिक्ष एक निर्वात (वैक्यूम) है, जहां ध्वनि तरंगें यात्रा ही नहीं कर सकतीं। लेकिन हमारे फॉरवर्ड-वीरों के लिए भौतिकी के नियम कोई मायने नहीं रखते। उनके लिए तो नासा का मतलब ही ‘नेशनल एसोसिएशन ऑफ संस्कारी एक्टिविटीज’ बन चुका है।
निष्कर्ष: ज्ञान का यह ओवरडोज रोकिए
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के इन दावों की कड़वी सच्चाई यही है कि यह सिर्फ मुफ्त इंटरनेट और खाली दिमाग की उपज हैं। अगली बार जब आपके परिवार के किसी ग्रुप में ऐसा कोई ‘चमत्कारी’ मैसेज आए, तो उसे आगे बढ़ाने के बजाय, थोड़ा फैक्ट-चेक का ‘सैनिटाइजर’ इस्तेमाल करें। अपने दिमाग की बत्ती जलाएं, अंधविश्वास की नहीं!