यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनके ‘राष्ट्र प्रथम’ के संकल्प को याद किया। ‘काक-वाणी’ के दफ्तर की मुंडेर पर बैठे कौवे ने जब यह खबर सुनी, तो उसने अपनी तीखी चोंच से सिर खुजलाया। आखिरकार, हमारी समकालीन राजनीति में विरोधाभासों की ऐसी शानदार जुगलबंदी ही तो असली मनोरंजन है!
कवि हृदय अटल और योगी जी का ‘कड़क’ राष्ट्रवाद
अटल जी का राष्ट्रवाद कविता की संवेदनशील पंक्तियों में बहता था, जिसमें धुर विरोधियों को भी साथ लेकर चलने की ‘उदारता’ थी। वे संसद में तर्क से जीतते थे। लेकिन समय बदल चुका है, और योगी जी ने उस ‘राष्ट्र प्रथम’ के सिद्धांत को थोड़ा ‘अपग्रेड’ कर दिया है। आज राष्ट्रवाद का मतलब है- “पहले आप हमारी परिभाषा मानिए, वरना आपके घर के बाहर पीला पीला बुलडोजर न्याय करने के लिए तैयार खड़ा है।” योगी जी ने अटल जी की प्रसिद्ध पंक्ति ‘हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा’ को एक नया रूप दिया है- ‘बात नहीं मानूंगा, और सीधे ठोक दूंगा।’
‘राजधर्म’ की नई व्याख्या: जब जेसीबी बोलेगी!
अटल जी ने कभी इतिहास के पन्नों में एक मुख्यमंत्री को ‘राजधर्म’ का पालन करने की सलाह दी थी। आज ‘काक-वाणी’ सोच रही है कि अगर अटल जी आज के उत्तर प्रदेश को देखते, तो शायद अपनी कविता में ‘राजधर्म’ की जगह ‘बुलडोजर-धर्म’ शब्द का इस्तेमाल करते। आज ‘नेशन फर्स्ट’ का मतलब है कि सरकार का फैसला सबसे पहले, और कानून की स्थापित प्रक्रिया… खैर, वह तो आराम से पीछे-पीछे आती रहेगी। अटल जी की राजनीति में ‘गठबंधन’ की मजबूरी और सबको सुनने का धैर्य था। आज की राजनीति में ‘सबको निपटाने’ का अद्भुत साहस है।
श्रद्धांजलि का यह पावन खेल
भारतीय राजनीति में अपने पूर्वजों को याद करना एक बहुत ही सुरक्षित और पवित्र खेल है। आप उनकी तस्वीर पर गुलाब के फूल चढ़ा सकते हैं, उनके ‘राष्ट्र प्रथम’ के नारे को हवा में उछाल सकते हैं, और फिर वापस जाकर अपनी उसी ‘ठोक दो’ वाली राजनीति में व्यस्त हो सकते हैं जो उनके सिद्धांतों से कोसों दूर है। योगी जी ने अटल जी को याद करके यह साबित कर दिया है कि इतिहास को याद रखना कितना जरूरी है, विशेष रूप से तब जब आपको वर्तमान में उसकी शिक्षाओं की बिल्कुल भी परवाह न करनी हो।
काक-वाणी का मानना है कि अटल जी स्वर्ग में बैठकर अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ सोच रहे होंगे, “मेरी कविताएं तो केवल किताबों में रह गईं, असली ‘बुलडोजर’ कविता तो अब यूपी की सड़कों पर लिखी जा रही है!”
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