संयुक्त राष्ट्र के ‘ज्ञानियों’ की नई कांव-कांव: अब भारत को लोकतंत्र का ट्यूशन देंगे विदेशी उस्ताद!

अरे वाह! जिनेवा के वातानुकूलित कमरों में बैठकर कॉफी की चुस्कियां लेते हुए संयुक्त राष्ट्र के महान विशेषज्ञों को अचानक भारत की याद आ गई। रॉयटर्स की खबर के मुताबिक, इन दयालु विद्वानों ने भारत सरकार से गुहार लगाई है कि कृपया प्रदर्शनों को रोकने के लिए ‘अत्यधिक बल’ का प्रयोग बंद करें। काक-वाणी परिवार इस अंतरराष्ट्रीय चिंता पर गद्गद है और उन सभी विदेशी ज्ञानियों के चरणों में दूर से ही प्रणाम अर्पण करता है।

विश्व शांति के नए ठेकेदारों का ‘मुफ़्त परामर्श’

वाह जी वाह! जब पूरी दुनिया में तीसरे विश्व युद्ध की आहट हो, जगह-जगह बम बरस रहे हों, तब संयुक्त राष्ट्र का सबसे महत्वपूर्ण काम क्या होना चाहिए? जाहिर है, भारत के ‘लाठी-चार्ज’ और ‘वॉटर कैनन’ की तीव्रता नापना! UN के इन परम ज्ञानी विशेषज्ञों को लगता है कि भारतीय पुलिस जब प्रदर्शनकारियों पर ठंडे पानी की बौछारें छोड़ती है, तो वह मानव अधिकारों का हनन है। अरे साहब, आपको क्या मालूम! हमारे देश में तो कड़कती गर्मी में मुफ्त में नहाने की व्यवस्था की जाती है, और ये विदेशी इसे ‘अत्याचार’ बता रहे हैं!

हमारे देश का लोकतंत्र इतना जीवंत है कि यहाँ प्रदर्शन करना एक राष्ट्रीय खेल की तरह है। अब अगर खेल में थोड़ा-बहुत ‘लाठी का तड़का’ न लगे, तो हमारे भारतीय प्रदर्शनकारियों को भी अपनी मेहनत सफल नहीं लगती। लेकिन नहीं, जिनेवा वाले साहबों को तो हर बात में अपना चश्मा लगाकर देखना है।

वाटर कैनन, लाठी-चार्ज और अंतरराष्ट्रीय ज्ञान की गंगा

इस महान अंतरराष्ट्रीय ज्ञान के बाद हमारे गृह मंत्रालय के दफ्तरों में तो हड़कंप मच गया होगा! अफ़सर अब सोच रहे होंगे कि अगली बार जब उग्र भीड़ उपद्रव करे, तो पुलिस वाले क्या हाथ में गुलाब का फूल लेकर खड़े हों? या फिर प्रदर्शनकारियों को चाय-समोसा पिलाकर शांति से घर जाने की विनती करें?

दुनिया भर में असली युद्ध न रोक पाने वाला संयुक्त राष्ट्र जब भारत को अनुशासन का पाठ पढ़ाता है, तो काक-वाणी को बड़ी दया आती है। जिन साहबों से अपने अंतरराष्ट्रीय मामले नहीं संभल रहे, वे भारत में डंडे की लंबाई और आँसू गैस के गोले का प्रेशर मॉनिटर कर रहे हैं।

खैर, हम तो यही सलाह देंगे कि अगली बार जब UN के ये विशेषज्ञ भारत आएं, तो उन्हें किसी भव्य धरना स्थल का सीधा अनुभव कराया जाए। तब शायद उन्हें समझ आएगा कि भारत में ‘बल’ का प्रयोग अत्यधिक नहीं, बल्कि बिलकुल ‘स्वादानुसार’ होता है!


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कागा जी