बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से हरे-भरे गाँव में माधव नाम का एक गरीब लेकिन बेहद दयालु किसान रहता था। माधव और उसकी पत्नी देवकी की कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण उनके जीवन में एक खालीपन था। एक दिन माधव को जंगल के रास्ते में नेवले का एक छोटा, अनाथ बच्चा मिला जो भूख से तड़प रहा था। माधव को उस पर दया आ गई और वह उसे अपने घर ले आया।
देवकी ने उस छोटे नेवले को अपने बच्चे की तरह पाला, उसे दूध पिलाया और उसका नाम ‘शेरू’ रखा। कुछ समय बाद, भगवान की कृपा से देवकी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। अब उनके घर में खुशियाँ दोगुनी हो गई थीं। शेरू और वह छोटा बच्चा आपस में सगे भाइयों की तरह रहने और खेलने लगे। शेरू घर के सदस्यों से बेहद प्यार करता था और हमेशा बच्चे के पास ही बैठा रहता था।
ममता की शंका और विश्वास की परीक्षा
देवकी शेरू से बहुत प्यार करती थी, लेकिन एक माँ होने के नाते उसके मन में हमेशा एक अनजाना डर रहता था। वह सोचती थी कि आखिर शेरू एक जानवर ही तो है, कहीं वह अनजाने में उसके बच्चे को नुकसान न पहुँचा दे। माधव हमेशा उसे समझाता था कि प्यार की भाषा हर जीव समझता है, और शेरू उनके बच्चे का रक्षक है, भक्षक नहीं।
एक दोपहर, माधव खेतों में काम करने गया हुआ था। देवकी को कुएं से पीने का पानी लेने जाना था। उसने अपने बच्चे को पालने में सुलाया और शेरू की तरफ देखते हुए कहा, “शेरू, मैं थोड़ी देर में आती हूँ, मेरे लाल का ख्याल रखना।” शेरू ने अपनी पूंछ हिलाकर मानो हामी भर दी। देवकी पानी का घड़ा लेकर बाहर चली गई।
काल का आगमन और शेरू की बहादुरी
देवकी के जाने के कुछ ही पल बाद, न जाने कहाँ से एक जहरीला काला सांप कमरे के अंदर रेंगता हुआ दाखिल हुआ। वह सांप सीधा सोते हुए बच्चे के पालने की तरफ बढ़ रहा था। कोने में बैठे शेरू की नजर जैसे ही सांप पर पड़ी, उसका खून खौल उठा। अपने छोटे भाई की जान खतरे में देख, शेरू बिना डरे उस जहरीले सांप पर टूट पड़ा।
कमरे में एक भयानक खूनी संघर्ष शुरू हो गया। सांप ने शेरू पर कई वार किए, लेकिन वफादार शेरू ने अपनी जान की परवाह न करते हुए सांप के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। इस लड़ाई में सांप का खून शेरू के मुंह और पंजों पर लग गया था। अपने भाई की जान बचाकर शेरू बहुत खुश था। वह अपनी मालकिन को यह खुशखबरी सुनाने और शाबाशी पाने के लिए दौड़कर घर के मुख्य दरवाजे पर बैठ गया और देवकी का इंतजार करने लगा।
क्रोध का विनाशकारी परिणाम
जब देवकी पानी का घड़ा सिर पर रखकर घर लौटी, तो उसने दरवाजे पर खून से सने शेरू को देखा। शेरू के मुंह पर खून लगा देखकर देवकी के पैरों तले जमीन खिसक गई। ममता के अतिरेक और डर में उसने सोचा कि इस जंगली जानवर ने उसके मासूम बच्चे को मार डाला है।
क्रोध और गहरे दुख में अंधी होकर, देवकी ने बिना सोचे-समझे सिर पर रखा पानी से भरा भारी मिट्टी का घड़ा पूरी ताकत से शेरू के ऊपर गिरा दिया। घड़े की भारी चोट से शेरू की रीढ़ की हड्डी टूट गई। उसने अपनी मालकिन की तरफ एक दर्दभरी और बेगुनाही से भरी नजर डाली, और वहीं तड़पकर दम तोड़ दिया।
पछतावे के आंसू और कड़वा सच
रोती-बिलखती देवकी पागलों की तरह दौड़कर कमरे के भीतर गई। वहाँ का नजारा देखकर उसका दिल दहल गया। उसका बच्चा पालने में सुरक्षित सो रहा था और पास ही जमीन पर एक विशाल काले सांप के कटे हुए टुकड़े बिखरे पड़े थे।
देवकी को तुरंत अपनी भयानक भूल का अहसास हो गया। शेरू ने तो उसके बच्चे की जान बचाई थी, और बदले में उसने अपने ही रक्षक और वफादार मित्र को बेरहमी से मार डाला। देवकी शेरू के बेजान शरीर को अपनी छाती से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगी, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। उसके जल्दबाजी में लिए गए फैसले ने उसके सबसे वफादार रक्षक को हमेशा के लिए छीन लिया था।
कहानी से सीख (Moral of the Story)
इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि क्रोध और जल्दबाजी में लिया गया निर्णय हमेशा विनाशकारी होता है। किसी भी परिस्थिति में सच जाने बिना कदम उठाने से जीवनभर का पछतावा ही हाथ लगता है।