सुंदरवन का अनोखा गठबंधन
बहुत समय पहले की बात है, सुंदरवन के एक विशाल बरगद के पेड़ पर ‘नयन’ नाम का एक अंधा चील और ‘चीकू’ नाम की एक लंगड़ी गिलहरी रहते थे। प्रकृति की क्रूरता के कारण दोनों को अपने-अपने समूहों द्वारा अकेला छोड़ दिया गया था। लेकिन इस एकाकीपन ने उनके बीच एक गहरे और पवित्र रिश्ते को जन्म दिया। दोनों ने एक अनूठा समझौता किया था—नयन के मजबूत पंख चीकू के पैर बन गए और चीकू की चमकीली आँखें नयन का मार्गदर्शक बन गईं।
नयन हवा में उड़कर ऊंचे पेड़ों से मीठे फल और भोजन ले आता था, और चीकू जमीन पर बैठकर उसे सही दिशा बताता था। वे दोनों एक-दूसरे के पूरक बन चुके थे। वन के अन्य शक्तिशाली और अभिमानी जानवर अक्सर उनका मजाक उड़ाते थे और कहते थे कि दो लाचार जीव मिलकर भला संकट में कैसे बचेंगे। लेकिन नयन और चीकू ने कभी उनकी परवाह नहीं की और अपनी छोटी सी दुनिया में बेहद खुश रहे।
संकट की काली छाया
एक दिन, भीषण गर्मी के कारण जंगल के सूखे पत्तों में घर्षण हुआ और पूरे सुंदरवन में विनाशकारी आग लग गई। देखते ही देखते आग की लपटें आसमान छूने लगीं। जंगल में चारों तरफ हाहाकार मच गया। सभी जानवर अपनी जान बचाकर भागने लगे। चीकू और नयन के बरगद के पेड़ को भी आग की लपटों ने घेर लिया। हवा में दम घोंटने वाला धुआं भर गया था, जिससे सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था।
नयन ने घबराकर कहा, “चीकू, तुम बहुत छोटे हो और तेजी से रेंगकर किसी सुरक्षित बिल में छिप सकते हो। मुझे यहीं छोड़ दो और अपनी जान बचाओ। मैं देख नहीं सकता, इसलिए मैं उड़कर खुद को नहीं बचा पाऊंगा।”
चीकू की आँखों में आँसू आ गए। उसने नयन के सिर को अपनी नन्हीं बाहों में समेट लिया और रोते हुए कहा, “मित्र! सुख में तो सब साथ देते हैं, लेकिन जो संकट में हाथ छोड़ दे, वह मित्र कैसा? हम जिएंगे भी साथ और मरेंगे भी साथ। अपनी आँखें मुझ पर छोड़ दो और बस उड़ने को तैयार हो जाओ।”
भावना और एकता की जीत
चीकू फुर्ती से नयन की पीठ पर बैठ गया और उसकी आँखों के ठीक ऊपर रहकर दिशा बताने लगा। चीकू चिल्लाया, “नयन, पूरे वेग से ऊपर उड़ो! अब थोड़ा बाईं ओर मुड़ो, वहाँ आग कम है!”
नयन ने अपने मित्र के शब्दों पर अटूट विश्वास किया। उसने अपनी पूरी ताकत से पंख फड़फड़ाए और उड़ चला। धुएं के काले बादलों और आग की तपिश के बीच, चीकू लगातार रास्ता दिखाता रहा और नयन बिना डरे उड़ता रहा। रास्ते में उन्हें एक छोटा खरगोश का बच्चा भी मिला जो आग से घिरा हुआ था। चीकू ने फुर्ती से उसे भी अपनी पीठ पर उठा लिया।
अंततः, दोनों की अटूट श्रद्धा, विश्वास और एकता के कारण वे आग के उस भयानक चक्रव्यूह से सुरक्षित बाहर निकल आए। सुंदरवन के अन्य जानवर, जो खुद को बहुत शक्तिशाली समझते थे, आज इन दो लाचार जीवों की निस्वार्थ दोस्ती और बहादुरी को देखकर शर्म से सिर झुकाए खड़े थे।
कहानी की सीख
सीख: इस पंचतंत्र की नैतिक कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची मित्रता की परीक्षा केवल संकट के समय ही होती है। जब हम अपनी कमजोरियों को भूलकर निस्वार्थ भाव से एक-दूसरे का हाथ थामते हैं, तो जीवन की सबसे बड़ी आपदा को भी आसानी से पार किया जा सकता है। एकता और आपसी विश्वास में ही वास्तविक शक्ति निहित है।