समाजवादियों का नया ‘आर्टिफिशियल’ प्रेम: जब अखिलेश बाबू को याद आया ‘एआई’ का धर्म!

वाह! युग बदल गया है, और उसके साथ हमारे समाजवाद का रंग भी बदल गया है। कभी जो समाजवादी पार्टी कंप्यूटर और अंग्रेजी का विरोध करके क्रांति लाने का सपना देखती थी, आज उसके मुखिया अखिलेश यादव जी ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) के नीतिशास्त्र पर प्रवचन दे रहे हैं। अखिलेश बाबू ने भाजपा को नसीहत दी है कि एआई का इस्तेमाल ‘नेगेटिव पॉलिटिक्स’ के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक भलाई के लिए होना चाहिए। ‘काक-वाणी’ इस ऐतिहासिक वैचारिक परिवर्तन पर अपनी चोंच झुकाकर नमन करती है।

लैपटॉप से ‘लार्ड एआई’ तक का सफर

एक समय था जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी विकास की पहचान मुफ्त लैपटॉप हुआ करती थी, जो चालू होते ही अपनी वॉलपेपर छवि से जनता का कल्याण कर देते थे। अब तकनीक अपग्रेड हो चुकी है। अखिलेश जी चाहते हैं कि एआई का इस्तेमाल गरीबी मिटाने और रोजगार देने के लिए हो। कितना क्रांतिकारी विचार है! लेकिन शायद अखिलेश बाबू भूल गए कि भारतीय राजनीति में सबसे बड़ी ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (Artificial Intelligence) तो वह चुनावी घोषणापत्र हैं, जो चुनाव के बाद खुद-ब-खुद डिलीट हो जाते हैं। अगर एआई का सही इस्तेमाल हुआ, तो नेताओं के भाषणों की ‘फैक्ट चेकिंग’ हो जाएगी, और अगर ऐसा हुआ तो सबसे बड़ा नुकसान तो खुद राजनीति का ही होगा।

एआई बनाम असली ‘एम-वाई’ समीकरण

अखिलेश जी का निशाना सीधे भाजपा के उस ‘आईटी सेल’ पर है, जो सोशल मीडिया पर रचनात्मकता की बाढ़ लाया रहता है। उनका डर जायज है, कहीं एआई के जरिए उनके नेताओं के भी डीपफेक वीडियो न बन जाएं। लेकिन समाजवादी पार्टी को यह समझना होगा कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में असली इंटेलिजेंस ‘एआई’ (AI) नहीं, बल्कि ‘एम-वाई’ (M-Y) समीकरण है। जब तक जमीन पर जाति और बिरादरी का ‘नेचुरल डेटा’ मौजूद है, तब तक इस ‘आर्टिफिशियल’ डेटा की क्या बिसात? क्या कोई सुपरकंप्यूटर भी यह गणना कर सकता है कि किस बूथ पर कौन सा वोटर किस दबाव में वोट डालेगा? इसके लिए तो स्थानीय नेताओं की ‘प्राकृतिक बुद्धि’ ही काम आती है।

खैर, नसीहत अच्छी है। लेकिन काक-वाणी का मानना है कि जब तक राजनीति खुद ‘नेगेटिव’ रहेगी, तब तक तकनीक ‘पॉजिटिव’ कैसे हो सकती है? भाजपा और सपा, दोनों ही दल एआई का इस्तेमाल एक-दूसरे की रील्स बनाने और मीम्स के जरिए चरित्र हरण करने में करेंगे, यह तय है। अखिलेश जी, आप एआई को समाज सेवा में लगाइए, और तब तक यूपी की जनता अपनी ‘रियल इंटेलिजेंस’ का इस्तेमाल करके अगले चुनाव में आपके और भाजपा के ‘एल्गोरिदम’ को डिकोड करने की कोशिश करेगी। जय हो डिजिटल समाजवाद की!


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कागा जी