समाजवाद का नया सिद्धांत: एक परिवार, पांच सांसद और असीमित ‘घरेलू’ विकास!

लोकतंत्र के इस पावन युग में जब पूरा देश ‘परिवारवाद’ के नाम पर छाती पीट रहा है, तब समाजवाद के परम ज्ञानी अखिलेश यादव ने ज्ञान की ऐसी गंगा बहाई है कि चाणक्य भी स्वर्ग में बैठकर अपनी नीतियां दोबारा लिख रहे होंगे। अखिलेश बाबू ने डंके की चोट पर स्वीकार किया है कि ‘कभी-कभी परिवारवाद के अपने फायदे होते हैं।’ वाह! क्या अद्भुत और क्रांतिकारी विचार है। अब तक हम मूर्ख वोटर यही सोचते थे कि राजनीति में योग्यता, जमीनी संघर्ष और जनता की सेवा मायने रखती है, लेकिन सपा प्रमुख ने हमारा चश्मा साफ करके दिखा दिया कि असली योग्यता तो सिर्फ ‘यादव खानदान’ के आंगन में जनम लेने से ही आती है।

घर की बात, संसद के साथ: जब डिनर टेबल ही बन जाए पार्लियामेंट्री बोर्ड

जरा गहराई से सोचिए, पांच पारिवारिक सांसदों के होने से समाजवादी पार्टी को कितना बड़ा फायदा है! सबसे बड़ी बचत तो पार्टी फंड की है। किसी गंभीर राजनीतिक मुद्दे पर चर्चा के लिए कोई बड़ी बैठक बुलाने की जरूरत ही नहीं है। सुबह के नाश्ते पर, डाइनिंग टेबल पर ही पूरी राष्ट्रीय नीति तय हो जाती है। अखिलेश जी आलू का पराठा चबाते हुए कहेंगे- “सुनो डिंपल, आज संसद में इस बिल का विरोध करना है,” और बस, पार्टी का स्टैंड क्लियर! इसे कहते हैं ‘कॉस्ट-इफेक्टिव और टाइम-सेविंग’ गवर्नेंस। बाहरी नेताओं को टिकट देने का झंझट ही क्यों पालना? वे कल को बागी हो सकते हैं, लेकिन घर के बच्चे तो कम से कम टिकट कटने और पॉकेट मनी बंद होने के डर से हमेशा आज्ञाकारी रहेंगे।

समाजवाद का नया अर्थ: ‘हमारा परिवार ही हमारा समाज है’

अखिलेश जी के इस ऐतिहासिक बयान के बाद, राम मनोहर लोहिया की आत्मा को भी असीम शांति मिल गई होगी। उन्होंने शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके ‘समाजवाद’ का विकास एक दिन ‘पारिवारिक पेंशन योजना’ के रूप में होगा। समाजवादी पार्टी के वे जमीनी कार्यकर्ता, जो सालों से झंडे उठा रहे हैं, पुलिस की लाठियां खा रहे हैं और दरी बिछा रहे हैं, उन्हें इस बयान से कितनी तसल्ली मिली होगी! उन्हें अब साफ समझ आ गया है कि उनका काम सिर्फ ‘भैया-भाभी’ जिंदाबाद के नारे लगाना है, क्योंकि संसद की मखमली सीटें तो केवल ‘पारिवारिक विरासत’ के वारिसों के लिए ही आरक्षित हैं।

‘काक-वाणी’ का तो यही मानना है कि देश की सभी पार्टियों को इस ‘यादव मॉडल’ को तुरंत अपना लेना चाहिए। जब देश में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ की बात हो सकती है, तो ‘वन फैमिली, वन पार्टी’ क्यों नहीं? आखिर जनता की सेवा का पुण्य कमाने के लिए बाहर के लोगों को मौका क्यों दिया जाए, जब घर के ही होनहार भाई-भतीजे और बहुएं देश सेवा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने को तैयार बैठे हों!


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कागा जी